बागपत जिले के बड़ौत क्षेत्र में स्थित केमिकल इंडस्ट्री इन दिनों गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रही है। अंतरराष्ट्रीय हालात के चलते एक्सपोर्ट प्रभावित हुआ है, वहीं कच्चे माल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी ने प्रोडक्शन लागत बढ़ा दी है। इसके चलते कई फैक्ट्रियां पिछले 15 दिनों से बंद पड़ी हैं, जिससे स्थानीय रोजगार और व्यापार पर भी असर पड़ रहा है।
बड़ौत की केमिकल फैक्ट्रियों में प्रोडक्शन पूरी तरह ठप हो गया है। मशीनें बंद हैं और लेबर का काम रुक गया है। उद्योग से जुड़े लोगों के अनुसार, मौजूदा परिस्थितियों ने इंडस्ट्री पर दोहरी मार पड़ी है एक तरफ एक्सपोर्ट ऑर्डर कैंसिल हो रहे हैं, दूसरी ओर कच्चे माल की लागत लगातार बढ़ रही है।
कच्चा माल महंगा और सीमित उपलब्धता: उद्योग प्रतिनिधियों के अनुसार, कच्चे माल की कीमतों में 35 से 40 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है। साथ ही इसकी उपलब्धता भी कम हो गई है। जनवरी-फरवरी में जहां रॉ सल्फर 48-50 रुपये प्रति किलो था, वह अब बढ़कर करीब 80 रुपये प्रति किलो हो गया है। गैस की कमी के कारण कई यूनिट्स को कोयले पर निर्भर होना पड़ा है, जिसकी कीमत भी 8 रुपये से बढ़कर 12 रुपये प्रति किलो हो गई है।
निर्यात पर असर, कंटेनर फंसे: निर्यात क्षेत्र में भी स्थिति गंभीर बनी हुई है। कई कंटेनर बंदरगाहों पर फंसे हुए हैं, जिससे आपूर्ति प्रभावित हो रही है। परिवहन लागत में भी भारी वृद्धि दर्ज की गई है। पहले जहां एक कंटेनर का भाड़ा लगभग 1000 डॉलर था, अब यह बढ़कर 4500 से 5000 डॉलर तक पहुंच गया है। इसके अलावा 300 डॉलर का अतिरिक्त वॉर सरचार्ज भी जोड़ा गया है।
ऑर्डर रद्द, करोड़ों का नुकसान: मार्च महीने में ही करीब 13 से 14 करोड़ रुपये के निर्यात ऑर्डर रद्द हो चुके हैं। इससे उद्योगों की वित्तीय स्थिति पर असर पड़ा है और भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
डोमेस्टिक मार्केट पर भी असर: घरेलू बाजार में भी कच्चे माल और तैयार उत्पादों की कीमतों में पिछले 20-25 दिनों से लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इसका प्रभाव छोटे व्यापारियों और खरीदारों पर भी देखा जा रहा है।
कई सेक्टर प्रभावित: पेस्टिसाइड और केमिकल उत्पादों का उपयोग केवल कृषि तक सीमित नहीं है, बल्कि फर्नीचर, रियल एस्टेट, पेंट और लेदर उद्योग में भी होता है। ऐसे में कीमतों में वृद्धि का प्रभाव कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
खरीफ सीजन पर असर की आशंका: आगामी खरीफ सीजन में पेस्टिसाइड की कीमतों में 35 से 40 प्रतिशत तक वृद्धि की संभावना जताई जा रही है। इससे खेती की लागत बढ़ सकती है और उत्पादन पर असर पड़ सकता है।
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