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पीएम मोदी की वीडियो विवाद के बाद मेटा पर सख्ती, भारत सरकार ने एल्गोरिदम पर भी मांगा जवाब

केंद्र ने कहा कि भारत में काम करने वाली मेटा की सेवाओं को भारतीय कानूनों का पालन करना होगा; डीपफेक, आपत्तिजनक सामग्री और कंटेंट मॉडरेशन को लेकर भी कंपनी से जवाब मांगा गया।
Bureau
Bureau News Desk
11 Aug 2026
11:37 AM
1 min read
पीएम मोदी की वीडियो विवाद के बाद मेटा पर सख्ती, भारत सरकार ने एल्गोरिदम पर भी मांगा जवाब
हाइलाइट्स
पीएम मोदी के वीडियो का मामला: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक फेसबुक वीडियो जुलाई 2026 में कुछ समय के लिए हट गया था। मेटा ने इसे परिचालन संबंधी गलती बताया, लेकिन सरकार ने शुरुआती स्पष्टीकरण को पर्याप्त नहीं माना।
एल्गोरिदम पर सवाल: केंद्र ने मेटा से उसके एल्गोरिदम और कंटेंट मॉडरेशन व्यवस्था को लेकर जवाब मांगा है, खासकर डीपफेक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बनी भ्रामक सामग्री की पहचान को लेकर।
बाल सुरक्षा का मुद्दा: इंस्टाग्राम पर बाल यौन शोषण से संबंधित सामग्री वाले विज्ञापनों के मामले में सरकार और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने कार्रवाई शुरू की।
सेफ हार्बर पर चेतावनी: संसदीय समिति ने नियमों के गंभीर उल्लंघन की स्थिति में मेटा की सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 के तहत मिलने वाली ‘सेफ हार्बर’ सुरक्षा पर सवाल उठाने की चेतावनी दी है।

भारत और दुनिया की बड़ी तकनीकी कंपनियों के बीच रिश्ते अब केवल सोशल मीडिया और डिजिटल सेवाओं तक सीमित नहीं रह गए हैं। प्लेटफॉर्म पर दिखाई देने वाली सामग्री, उसके पीछे काम करने वाले एल्गोरिदम, उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार सामग्री और भारतीय कानूनों के अनुपालन जैसे मुद्दे भी अब सीधे नियामकीय बहस के केंद्र में हैं।

मेटा को लेकर हाल के घटनाक्रम ने इसी बहस को और तेज कर दिया है। फेसबुक पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो कुछ समय के लिए हटाए जाने के बाद केंद्र सरकार ने कंपनी से जवाब मांगा। मेटा ने इसे परिचालन संबंधी गलती बताया और बाद में वीडियो बहाल कर दिया, लेकिन सरकार ने शुरुआती स्पष्टीकरण को पर्याप्त नहीं माना। इसके बाद बातचीत का दायरा केवल एक वीडियो तक नहीं रहा। सरकार ने मेटा के एल्गोरिदम, कंटेंट मॉडरेशन, डीपफेक और हानिकारक सामग्री की पहचान को लेकर भी सवाल उठाए। दूसरी ओर, इंस्टाग्राम पर बाल यौन शोषण से संबंधित विज्ञापनों के मामले ने प्लेटफॉर्म की निगरानी व्यवस्था पर अलग सवाल खड़े किए। इसी बीच संसदीय संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी समिति की ओर से मेटा की जवाबदेही और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 के तहत मिलने वाली ‘सेफ हार्बर’ सुरक्षा को लेकर भी चेतावनी सामने आई है।

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जुलाई 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का युवाओं से संबंधित एक वीडियो फेसबुक से कुछ समय के लिए हट गया। वीडियो में प्रधानमंत्री ने युवाओं से जुड़े एक मुद्दे और परीक्षा प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ सख्त कानून की जरूरत का उल्लेख किया था। मेटा की ओर से बाद में कहा गया कि वीडियो का प्रतिबंधित होना एक परिचालन संबंधी त्रुटि थी। कंपनी ने वीडियो को बहाल भी कर दिया। लेकिन केंद्र सरकार ने कंपनी के इस स्पष्टीकरण को तत्काल स्वीकार नहीं किया। सरकार की ओर से कहा गया कि मामला केवल तकनीकी गलती बताकर समाप्त नहीं किया जा सकता और कंपनी को इस संबंध में विस्तृत स्पष्टीकरण देना होगा। यही वह बिंदु था, जहां एक सोशल मीडिया पोस्ट का विवाद प्लेटफॉर्म की तकनीकी और नियामकीय जवाबदेही के बड़े सवाल में बदल गया।

मेटा के साथ बातचीत के दौरान केंद्र सरकार की ओर से एक महत्वपूर्ण बात सामने रखी गई—भारत में सेवाएं उपलब्ध कराने वाली वैश्विक टेक कंपनियों को भारतीय कानूनों और नियामकीय निर्देशों का पालन करना होगा। यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वैश्विक कंपनियां अपने प्लेटफॉर्म के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनाई गई नीतियों और तकनीकी प्रणालियों का इस्तेमाल करती हैं। अलग-अलग देशों में कानून, सामाजिक परिस्थितियां और नियामकीय आवश्यकताएं अलग हो सकती हैं। भारत सरकार का रुख यह है कि किसी वैश्विक कंपनी की आंतरिक नीति भारतीय कानूनों का विकल्प नहीं हो सकती। इसी संदर्भ में मेटा के एल्गोरिदम और कंटेंट मॉडरेशन व्यवस्था को लेकर सरकार की पूछताछ महत्वपूर्ण हो जाती है।

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सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कौन-सी सामग्री अधिक लोगों तक पहुंचेगी और कौन-सी सामग्री कम दिखाई देगी, इसमें एल्गोरिदम की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालित प्रणालियों के बढ़ते इस्तेमाल के साथ सामग्री की पहचान, प्राथमिकता तय करने और उसे हटाने की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक तकनीकी हो गई है। 

सरकार ने मेटा से एल्गोरिदम और कंटेंट मॉडरेशन व्यवस्था को लेकर जवाब मांगा है। खासतौर पर डीपफेक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार भ्रामक सामग्री और अन्य हानिकारक कंटेंट की पहचान तथा कार्रवाई की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए हैं। सरकार की चिंता यह है कि यदि ऐसी सामग्री तेजी से बड़ी संख्या में उपयोगकर्ताओं तक पहुंचती है, तो उसके प्रभाव को नियंत्रित करना कठिन हो सकता है। हालांकि, किसी भी प्लेटफॉर्म पर सामग्री को हटाने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन भी एक महत्वपूर्ण कानूनी और नीतिगत विषय है। इसी कारण एल्गोरिदम की पारदर्शिता और कंटेंट मॉडरेशन की जवाबदेही पर दुनिया भर में बहस चल रही है।

मेटा के सामने दूसरी गंभीर चुनौती इंस्टाग्राम पर बाल यौन शोषण से संबंधित सामग्री वाले विज्ञापनों का मामला है। जुलाई 2026 में केंद्र सरकार ने मेटा को इस विषय में नोटिस जारी कर ऐसे विज्ञापनों और सामग्री को हटाने के निर्देश दिए। सरकार ने यह भी जानना चाहा कि इस तरह की सामग्री से संबंधित विज्ञापन प्लेटफॉर्म पर किस प्रक्रिया के तहत दिखाई दिए। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने भी इस मामले को लेकर जांच शुरू की।

मेटा की ओर से बाल यौन शोषण सामग्री के प्रति शून्य-सहनशीलता की नीति होने की बात कही गई है। कंपनी के अनुसार, ऐसी सामग्री की पहचान और उसे हटाने के लिए तकनीकी तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियों का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रकरण ने यह सवाल जरूर सामने रखा कि स्वचालित सुरक्षा प्रणालियों के बावजूद प्रतिबंधित सामग्री प्लेटफॉर्म तक कैसे पहुंचती है और उसके प्रसार को रोकने के लिए कंपनियों की जवाबदेही किस स्तर तक तय की जानी चाहिए।

मेटा से जुड़े मौजूदा विवाद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा डीपफेक भी है। डीपफेक ऐसी कृत्रिम रूप से तैयार या बदली गई सामग्री होती है जिसमें किसी व्यक्ति की आवाज, तस्वीर या वीडियो को तकनीकी माध्यमों से इस तरह बदला जा सकता है कि वह वास्तविक प्रतीत हो। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर ऐसी सामग्री का प्रसार चुनाव, सार्वजनिक व्यक्तियों, नागरिकों और सामाजिक व्यवस्था से जुड़े कई सवाल खड़े कर सकता है। भारत सरकार ने मेटा से ऐसी सामग्री की पहचान और हटाने की व्यवस्था मजबूत करने को कहा है। इसके साथ ही कंटेंट मॉडरेशन और अधिक प्रभावी कार्रवाई तंत्र को लेकर भी कंपनी से जवाब मांगा गया है।

मेटा के मामले में सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सवालों में से एक सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 के तहत मिलने वाली ‘सेफ हार्बर’ सुरक्षा है। सरल भाषा में समझें तो कुछ निर्धारित शर्तों के तहत यह प्रावधान इंटरनेट मध्यस्थों को उपयोगकर्ताओं द्वारा पोस्ट की गई सामग्री के लिए सीधे कानूनी दायित्व से सुरक्षा देता है।

हालांकि यह सुरक्षा बिना शर्त नहीं है। मध्यस्थों को कानून में निर्धारित आवश्यकताओं और संबंधित नियमों का पालन करना होता है। इसी कारण संसदीय समिति की ओर से सेफ हार्बर सुरक्षा को लेकर उठाया गया सवाल मेटा के लिए महत्वपूर्ण है। समिति के अध्यक्ष निशिकांत दुबे ने नियमों के पालन में गंभीर चूक की स्थिति में मेटा की सेफ हार्बर सुरक्षा पर सवाल उठाने की चेतावनी दी है। फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि मेटा की सेफ हार्बर सुरक्षा समाप्त कर दी गई है। यह मुद्दा फिलहाल नियामकीय और संसदीय स्तर पर उठाए गए सवालों का हिस्सा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वीडियो से जुड़े विवाद के बाद मेटा की ओर से माफी मांगी गई। कंपनी ने वीडियो हटाए जाने को परिचालन संबंधी गलती बताया और उसे बहाल किया। इसके बाद मेटा के वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से भारतीय अधिकारियों के साथ बातचीत भी हुई। लेकिन सरकार की शुरुआती प्रतिक्रिया से स्पष्ट था कि केवल माफी को पर्याप्त समाधान नहीं माना जा रहा था। सरकार की चिंता प्लेटफॉर्म की उस व्यवस्था को लेकर थी जिसके तहत ऐसी सामग्री अस्थायी रूप से प्रतिबंधित हुई। यानी विवाद का केंद्र केवल यह नहीं रहा कि वीडियो क्यों हटाया गया, बल्कि यह भी बन गया कि भविष्य में ऐसी गलती दोबारा न हो, इसके लिए मेटा की तकनीकी और प्रशासनिक व्यवस्था क्या है।

मेटा और भारत सरकार के बीच हालिया मतभेद केवल फेसबुक और इंस्टाग्राम तक सीमित नहीं हैं। वाट्सऐप के प्रस्तावित यूजरनेम फीचर को लेकर भी केंद्र ने कंपनी से स्पष्टीकरण मांगा था। सरकार ने संभावित साइबर धोखाधड़ी और प्रतिरूपण से जुड़े जोखिमों को ध्यान में रखते हुए भारत में फीचर के विस्तार पर रोक लगाने को कहा था। वाट्सऐप ने सरकार के साथ बातचीत पूरी होने तक भारत में इस फीचर को लागू नहीं करने की जानकारी दी। यह घटनाक्रम दिखाता है कि सरकार अब केवल पहले से मौजूद सामग्री की निगरानी तक सीमित नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के नए फीचर और उनके संभावित प्रभावों पर भी नियामकीय नजर रख रही है।

मेटा और भारतीय नियामकों के बीच मतभेद कोई नया विषय नहीं हैं। वर्ष 2021 में वाट्सऐप की प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर विवाद सामने आया था। मुख्य सवाल यह था कि उपयोगकर्ताओं का डेटा किस तरह मेटा की दूसरी कंपनियों के साथ साझा किया जा सकता है। इसके बाद सूचना प्रौद्योगिकी नियमों और वाट्सऐप की मैसेज ट्रेसेबिलिटी तथा गोपनीयता नीति को लेकर भी मतभेद सामने आए। नवंबर 2024 में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग ने 2021 की वाट्सऐप प्राइवेसी पॉलिसी से जुड़े प्रतिस्पर्धा-विरोधी व्यवहार के मामले में मेटा पर 213.14 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया। आयोग ने मेटा और वाट्सऐप की बाजार स्थिति तथा उपयोगकर्ता डेटा के इस्तेमाल से संबंधित पहलुओं पर भी अपने आदेश में विचार किया।

मेटा के साथ भारत के संबंधों में 2025 में एक अन्य विवाद भी सामने आया। मेटा के प्रमुख मार्क जकरबर्ग ने भारत के 2024 के आम चुनावों के संबंध में ऐसा दावा किया था जिसे बाद में कंपनी ने गलत माना। इसके बाद मेटा की ओर से सार्वजनिक रूप से माफी मांगी गई। इस घटना ने भारत में सोशल मीडिया कंपनियों की चुनावी और राजनीतिक सामग्री से जुड़ी जिम्मेदारी पर बहस को फिर चर्चा में ला दिया। हालांकि मौजूदा 2026 का विवाद अलग प्रकृति का है और इसका तत्काल कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फेसबुक वीडियो को अस्थायी रूप से हटाया जाना है।

मौजूदा विवाद के बीच संसदीय संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी समिति ने भी सोशल मीडिया कंपनियों के प्रतिनिधियों को चर्चा के लिए बुलाया। बैठक के दायरे में सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का नियमन, महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा, उपयोगकर्ता गोपनीयता और सार्वजनिक व्यवस्था जैसे विषय शामिल रहे।

मेटा के अलावा अन्य प्रमुख डिजिटल कंपनियों के प्रतिनिधियों को भी समिति के समक्ष बुलाया गया। इससे संकेत मिलता है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही अब केवल किसी एक कंपनी का विषय नहीं है, बल्कि डिजिटल शासन और सार्वजनिक नीति का व्यापक हिस्सा बन चुकी है। मेटा से जुड़े मौजूदा घटनाक्रम ने कई स्तरों पर सवाल खड़े किए हैं। एक तरफ सरकार भारतीय कानूनों के पालन और उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा पर जोर दे रही है। दूसरी तरफ सोशल मीडिया कंपनियों के सामने वैश्विक नीतियों, स्थानीय कानूनों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और तकनीकी प्रणालियों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। एल्गोरिदम से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डीपफेक, बाल सुरक्षा और डेटा गोपनीयता तक डिजिटल प्लेटफॉर्म का नियमन लगातार जटिल हो रहा है।

भारत में मेटा को लेकर हालिया विवाद इसी बदलते नियामकीय परिदृश्य का हिस्सा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वीडियो से शुरू हुआ घटनाक्रम अब कंटेंट मॉडरेशन, एल्गोरिदम, भारतीय कानूनों के अनुपालन और सेफ हार्बर जैसे व्यापक कानूनी मुद्दों तक पहुंच चुका है। फिलहाल सरकार और मेटा के बीच बातचीत तथा जवाबदेही से जुड़े मुद्दे चर्चा में हैं। मेटा की ओर से कुछ मामलों में गलती स्वीकार कर माफी मांगी गई है, जबकि भारतीय पक्ष ने यह स्पष्ट किया है कि भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म के संचालन के लिए भारतीय कानूनों और नियामकीय निर्देशों का पालन आवश्यक है।

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