गोमांस केस पर इलाहाबाद कोर्ट ने दिया बड़ा फैसला

30 Apr 2026

 

 

गोमांस से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल संदेह के आधार पर किसी वाहन को जब्त करना कानूनन उचित नहीं है। अदालत ने कहा कि जब तक अधिकृत प्रयोगशाला से यह वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित न हो जाए कि बरामद मांस गोमांस है, तब तक की गई कार्रवाई मनमानी मानी जाएगी।

 

अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि बिना ठोस वैज्ञानिक साक्ष्य के किसी व्यक्ति की आजीविका के साधन को छीनना संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। एकल पीठ के न्यायाधीश जस्टिस संदीप जैन ने राज्य सरकार की कार्रवाई को दोषपूर्ण करार देते हुए इसे अवैध बताया।

 

यह मामला उत्तर प्रदेश के बागपत जिले से जुड़ा है। 18 अक्टूबर 2024 को पुलिस ने एक बोलेरो वाहन को इस संदेह में पकड़ा था कि उसमें गाय का मांस ले जाया जा रहा है। इसके बाद 16 जून 2025 को जिला मजिस्ट्रेट, बागपत ने वाहन को जब्त करने का आदेश दिया, जिसे बाद में मेरठ के मंडलायुक्त ने भी बरकरार रखा।

 

याचिकाकर्ता मोहम्मद चांद ने अदालत में दलील दी कि पशु चिकित्सक की रिपोर्ट में मांस को केवल “संदिग्ध” बताया गया था, न कि गोमांस के रूप में प्रमाणित। सुनवाई के दौरान राज्य के अपर शासकीय अधिवक्ता ने भी स्वीकार किया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं है, जो यह साबित करे कि बरामद मांस वास्तव में गोमांस था।

 

अदालत ने उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम, 1955 की धारा 5-ए(6) का उल्लेख करते हुए कहा कि इस तरह की कार्रवाई के लिए अधिकृत प्रयोगशाला की रिपोर्ट अनिवार्य है। चूंकि इस मामले में ऐसी कोई रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई, इसलिए जब्ती की पूरी प्रक्रिया को अवैध घोषित किया गया।

 

अदालत ने जिला मजिस्ट्रेट और मंडलायुक्त के आदेशों को निरस्त करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह सात दिनों के भीतर याचिकाकर्ता को 2 लाख रुपये का मुआवजा दे। अदालत ने यह भी कहा कि सरकार इस राशि की वसूली संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों से कर सकती है। इसके अलावा न्यायालय ने प्रशासन को निर्देशित किया कि याचिकाकर्ता के वाहन को तीन दिनों के भीतर तत्काल रिहा किया जाए।