>भारत में बीमा क्षेत्र लंबे समय से सीमित पहुंच, कम जागरूकता और भरोसे की कमी जैसी चुनौतियों से जूझता रहा है। इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत सबका बीमा सबकी रक्षा बीमा कानून संशोधन विधेयक, 2025 के तहत बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश FDI की सीमा को 100 प्रतिशत करने का प्रस्ताव सामने आया है। यह संशोधन बीमा उद्योग की संरचना और उपभोक्ता अनुभव में बड़े बदलाव का संकेत देता है।
>बीमा क्षेत्र में एफडीआई की सीमा वर्ष 2000 में 26 प्रतिशत से शुरू होकर 2015 में 49 प्रतिशत, 2021 में 74 प्रतिशत और अब 100 प्रतिशत तक पहुंची है। बजट घोषणाओं के अनुसार, वर्ष 2000 से अब तक इस क्षेत्र में कुल ₹82,847 करोड़ का एफडीआई आ चुका है, जिसमें से लगभग ₹61,989 करोड़ 2014 से जनवरी 2024 के बीच निवेश हुए। इसी अवधि में भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार बीमा कंपनियों की संख्या 53 से बढ़कर 73 हो गई।
>पूंजी प्रवाह के साथ बीमा पैठ में भी वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 2014 में लगभग 3.3 प्रतिशत रही बीमा पैठ महामारी से पहले 3.8 प्रतिशत तक पहुंची और कोविड काल में 4 प्रतिशत के स्तर को पार कर गई। यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि पूंजी उपलब्धता और बाजार विस्तार के बीच सीधा संबंध है। 100 प्रतिशत एफडीआई की अनुमति से वैश्विक बीमाकर्ताओं और पुनर्बीमा कंपनियों के लिए भारत में परिचालन या विस्तार के अवसर बढ़ेंगे। इससे जोखिम वहन क्षमता, पुनर्बीमा समर्थन और अंडरराइटिंग दक्षता में सुधार की संभावना है। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे स्वास्थ्य, विशेष बीमा, वार्षिकी और पुनर्बीमा जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ सकता है।
>अंतरराष्ट्रीय भागीदारी के साथ उन्नत एक्चुरियल मॉडल, डेटा-आधारित जोखिम मूल्यांकन और व्यक्तिगत जरूरतों पर आधारित उत्पाद सामने आ सकते हैं। प्रतिस्पर्धा बढ़ने से मूल्य निर्धारण, उत्पाद नवाचार, डिजिटल प्रक्रियाओं और दावा निपटान की गुणवत्ता पर भी असर पड़ने की उम्मीद है। नए ढांचे में आईआरडीएआई द्वारा पॉलिसीधारक शिक्षा एवं संरक्षण कोष और निगरानी शक्तियों को मजबूत करने पर जोर दिया गया है। डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, एकल पंजीकरण व्यवस्था और कानूनी सुधारों से बाजार में प्रवेश की बाधाएं कम हो सकती हैं।
>यदि इन सुधारों के साथ समग्र लाइसेंसिंग और खुले वितरण ढांचे जैसे कदम लागू होते हैं, तो भारत बीमा पैठ के मामले में USA, UK, Australia और यूरोप के परिपक्व बाजारों के औसत स्तर के करीब पहुंच सकता है। साथ ही, भविष्य में बीमा विस्तार को मापने के लिए शहरी-ग्रामीण अंतर, प्रति व्यक्ति बीमाकर्ता और कवरेज की पर्याप्तता जैसे संकेतकों पर भी ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता होगी।