आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव के बीच सोशल मीडिया पर यूजर्स की गुमनामी अब पहले जितनी सुरक्षित नहीं रह गई है। एक नई रिसर्च के मुताबिक, अब एआई मॉडल केवल यूजर के पोस्ट और ऑनलाइन गतिविधियों के आधार पर उसकी पहचान कर सकता है, भले ही उसने अपनी असली पहचान छिपा रखी हो।
यह अध्ययन अन्थ्रोपिक और ईटीएच जुरिच के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है। इसमें एक ऑटोमेटेड सिस्टम विकसित किया गया, जो यूजर के पोस्ट, कमेंट और बातचीत का विश्लेषण कर पहचान से जुड़े संकेत निकालता है।
रिसर्च के अनुसार, यह सिस्टम मल्टी-स्टेप प्रोसेस के जरिए टेक्स्ट डेटा से पैटर्न पहचानता है और संभावित मेल खोजता है। इसके बाद यह विश्लेषण करता है कि क्या अलग-अलग अकाउंट एक ही व्यक्ति से जुड़े हो सकते हैं। परीक्षण के दौरान यह मॉडल रेड्डिट और लिंक्डइन जैसे प्लेटफॉर्म्स पर अकाउंट्स को आपस में जोड़ने में सफल रहा।
शोध में पाया गया कि यूजर की लिखने की शैली, रुचियां, लोकेशन से जुड़े संकेत, शिक्षा और चर्चा के विषय जैसी छोटी-छोटी जानकारियां पहचान स्थापित करने में अहम भूमिका निभाती हैं। एआई सिस्टम इन संकेतों को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी से मिलाकर यूजर की प्रोफाइल तैयार करता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, किसी यूजर की जितनी अधिक ऑनलाइन गतिविधि और पोस्ट होती हैं, एआई के लिए उसकी पहचान करना उतना ही आसान हो जाता है। यह तकनीक खास तौर पर उन लोगों के लिए चिंता का विषय मानी जा रही है, जो छद्म नाम से सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं।
शोधकर्ताओं ने यह भी संकेत दिया है कि इस तरह की तकनीक का उपयोग निगरानी या साइबर हमलों के लिए किया जा सकता है, जिससे डेटा प्राइवेसी और डिजिटल सुरक्षा को लेकर नई चुनौतियां सामने आ सकती हैं।