लखनऊ। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सरोगेसी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि जिन दंपतियों ने सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 लागू होने से पहले कृत्रिम गर्भाधान (आईवीएफ) की प्रक्रिया शुरू कर दी थी और जिनके भ्रूण सुरक्षित (फ्रोजन) रखे गए हैं, उनके मामलों में नए कानून की आयु सीमा को यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में केवल आयु सीमा का हवाला देकर सरोगेसी की अनुमति से इन्कार करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा और प्रजनन संबंधी स्वायत्तता के अधिकार के विपरीत हो सकता है। यह आदेश न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति ए.के. चौधरी की खंडपीठ ने एक दंपती की ओर से दायर रिट याचिका का निस्तारण करते हुए पारित किया।
याचिकाकर्ता दंपती ने अदालत को बताया कि उन्होंने वर्ष 2021 से पहले ही आईवीएफ उपचार शुरू कर दिया था। उपचार के दौरान कई प्रयास किए गए, लेकिन गर्भधारण सफल नहीं हो सका। इस प्रक्रिया में उनके भ्रूण सुरक्षित रखे गए थे।
बाद में चिकित्सकीय सलाह के आधार पर दंपती ने सरोगेसी का विकल्प अपनाने का निर्णय लिया। हालांकि, इस बीच 25 जनवरी 2022 से सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 लागू हो गया, जिसके बाद निर्धारित आयु सीमा पार हो जाने के कारण उनके आवेदन पर आगे कार्रवाई नहीं हो सकी।
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने माना कि दंपती ने नया कानून लागू होने से पहले ही वैध रूप से प्रजनन प्रक्रिया शुरू कर दी थी। ऐसे में बाद में लागू हुए कानून की आयु सीमा को पूर्व प्रभाव से लागू करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
खंडपीठ ने कहा कि प्रत्येक मामले का निर्णय उसकी परिस्थितियों और तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। केवल तकनीकी आधार या आयु सीमा का हवाला देकर आवेदन अस्वीकार करना उचित नहीं होगा।
अदालत ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ), लखनऊ को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता दंपती के आवेदन पर दोबारा विचार करें। साथ ही यह भी कहा कि केवल आयु सीमा को आधार बनाकर सरोगेसी की अनुमति देने से इन्कार न किया जाए।
सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 के अनुसार सरोगेसी के लिए आवेदन करने वाले दंपती में पुरुष की आयु 26 से 55 वर्ष तथा महिला की आयु 23 से 50 वर्ष के बीच होना आवश्यक है। इसी प्रावधान के कारण याचिकाकर्ता दंपती की प्रक्रिया प्रभावित हुई थी, क्योंकि कानून लागू होने तक वे निर्धारित आयु सीमा से बाहर हो चुके थे।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि संतान प्राप्त करने का अधिकार व्यक्ति की गरिमा, निजता और प्रजनन संबंधी स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है, जिसकी सुरक्षा संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत की गई है।
खंडपीठ ने माना कि जिन दंपतियों ने कानून लागू होने से पहले वैध रूप से चिकित्सा प्रक्रिया शुरू कर दी थी, उनके मामलों में केवल आयु सीमा के आधार पर निर्णय लेना उचित नहीं होगा।