>इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक बेहद अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि आर्य समाज मंदिर से प्राप्त विवाह प्रमाणपत्र किसी भी व्यक्ति को कानूनी रूप से वैध शादी का प्रमाण नहीं माना जा सकता, जब तक वैवाहिक प्रक्रिया भारत के विधिसम्मत कानूनों के तहत पूरी न की गई हो। कोर्ट ने एक महिला द्वारा दायर अनुकंपा नियुक्ति याचिका को खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया।
>यह मामला तब सामने आया जब एक महिला ने कृषि विभाग में कार्यरत अपने कथित पति की मृत्यु के बाद अनुकंपा आधार पर नौकरी की मांग की। विभाग द्वारा आवेदन को खारिज किए जाने पर महिला ने उच्च न्यायालय की शरण ली और खुद को मृतक कर्मचारी की पत्नी सिद्ध करने के लिए आर्य समाज मंदिर में हुए विवाह का प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया।
>न्यायमूर्ति मनीष माथुर की एकल पीठ ने स्पष्ट कहा कि याचिकाकर्ता का विवाह प्रमाणित करने के लिए केवल आर्य समाज का प्रमाणपत्र और स्टांप पेपर पर दिया गया कथित तलाक क़ानून की दृष्टि में अस्वीकार्य हैं।
>कोर्ट ने कहा, “हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत ही किसी हिंदू दंपति का तलाक वैध माना जाएगा। बिना कोर्ट के डिक्री के तलाक मान्य नहीं है। उसी तरह, केवल आर्य समाज का प्रमाणपत्र विवाह को वैध सिद्ध नहीं कर सकता जब तक कि यह विधिक प्रक्रिया के अनुरूप न हो।”
>महिला ने दावा किया कि उसके पति ने वर्ष 2021 में अपनी पहली पत्नी से तलाक ले लिया था और इसके बाद दोनों ने आर्य समाज मंदिर में विवाह कर लिया। लेकिन कोर्ट ने पाया कि तलाक की कोई विधिक पुष्टि नहीं की गई है — न कोई कोर्ट ऑर्डर, न ही परिवार न्यायालय की डिक्री।
>कोर्ट ने कहा कि जब पहली पत्नी से वैध रूप से तलाक नहीं हुआ है तो दूसरी शादी को वैध नहीं माना जा सकता, और इसलिए महिला का दावा भी अमान्य है।
>इस फैसले से एक बार फिर यह स्पष्ट हुआ है कि विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मामलों में कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। न्यायालय ने इस याचिका को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को मृतक कर्मचारी की पत्नी मानने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।