बस्तर में नक्सली हिंसा से प्रभावित लोगों ने पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम के ‘दिमागी नक्सल’ संबंधी बयान को लेकर कांग्रेस पर सवाल उठाए हैं। मंगलवार को नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में बस्तर शांति समिति की पत्रकार वार्ता के दौरान नक्सली हिंसा में अपनों को खो चुके और हमलों में घायल हुए लोगों ने अपनी आपबीती साझा की।
पीड़ितों ने कहा कि जिन परिवारों ने नक्सली हमलों, गोलियों और बारूदी सुरंगों की वजह से अपने लोगों को खोया या गंभीर शारीरिक नुकसान झेला, उनके सामने नक्सली विचारधारा को लेकर सकारात्मक टिप्पणी करना उनके जख्मों को फिर से सामने लाने जैसा है। उन्होंने चिदंबरम के इंटरनेट मीडिया पोस्ट और पुराने बयानों के प्रिंटआउट वाले पोस्टर भी प्रदर्शित किए और कांग्रेस के पुराने रुख को लेकर सवाल उठाए।
पत्रकार वार्ता में पीड़ितों ने कहा कि हथियारबंद नक्सलवाद का दौर समाप्त हो चुका है, लेकिन उनके मुताबिक नक्सली विचारधारा से जुड़ी सोच पर भी सवाल उठाना जरूरी है। इसी संदर्भ में उन्होंने ‘दिमागी नक्सलवाद’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए कहा कि अब इस स्तर की विचारधारा का भी उपचार जरूरी है।
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पीड़ितों ने सवाल उठाया कि नक्सली हिंसा में जान गंवाने वाले जवानों और हिंसा से प्रभावित परिवारों के दर्द को राजनीतिक विमर्श में किस नजर से देखा जा रहा है। उनका आरोप था कि दिल्ली में बैठकर नक्सलवाद पर राजनीतिक बयान देना अलग बात है, जबकि बस्तर में आम लोगों और सुरक्षा बलों ने इसकी प्रत्यक्ष कीमत चुकाई है।
कांकेर निवासी गौतरीराम विश्वकर्मा ने पत्रकार वार्ता में बताया कि वर्ष 2009 में नक्सलियों ने उनका अपहरण किया था और उनके सीने तथा पेट में तीन गोलियां मारी गई थीं। उन्होंने अपने साथ हुई इस घटना का जिक्र करते हुए नक्सली हिंसा के असर के बारे में बताया।
सियाराम रामटेके ने बताया कि वर्ष 2022 में नक्सली गोली और हमले में घायल होने के बाद वह आज भी व्हीलचेयर और वाकर के सहारे चलते हैं। उनके मुताबिक हमले का प्रभाव लंबे समय बाद भी उनके दैनिक जीवन पर बना हुआ है।
पत्रकार वार्ता में मौजूद अन्य पीड़ितों ने भी नक्सली हिंसा से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। इनमें बलिदानी आरक्षक मोहन उडके की पत्नी आरती उडके, घायल जवान अमर सिंह कुमेटी, तरुण कलाकार, दंतेवाड़ा के नंदलाल मुड़ामी और बीजापुर के अवलम मारा शामिल थे।
बस्तर शांति समिति ने सीआरपीएफ कोबरा के घायल जवान रुद्रेश सिंह का उदाहरण भी सामने रखा। समिति के अनुसार, नक्सली हमले में गंभीर रूप से घायल होने के बाद उनके दोनों पैर काटने पड़े।
पीड़ितों ने इस तरह के मामलों का हवाला देते हुए कहा कि नक्सली हिंसा का असर केवल किसी एक घटना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे प्रभावित परिवारों को लंबे समय तक शारीरिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।
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पत्रकार वार्ता के दौरान समिति ने वर्ष 2010 के ताड़मेटला हमले का भी उल्लेख किया। समिति के अनुसार, उस हमले में 76 जवान शहीद हुए थे। पीड़ितों ने इस घटना के संदर्भ में कांग्रेस के पुराने रुख पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि नक्सली हिंसा को केवल वैचारिक संघर्ष के रूप में देखने से उन परिवारों का दर्द सामने नहीं आता, जिन्होंने अपने परिजनों को खोया है या हिंसा के कारण अपनी सामान्य जिंदगी बदलते देखी है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब बस्तर में नक्सलवाद के प्रभाव और क्षेत्र में शांति एवं विकास को लेकर राजनीतिक बहस जारी है।
बस्तर शांति समिति ने कहा कि 31 मार्च 2026 को बस्तर को नक्सल-मुक्त घोषित किए जाने के बाद क्षेत्र में शांति और विकास को लेकर नई उम्मीद पैदा हुई है। समिति ने बस्तर ओलंपिक्स, बस्तर पंडुम और गांवों में तिरंगा फहराने जैसी गतिविधियों का भी उल्लेख किया। पीड़ितों के अनुसार, क्षेत्र में अब बंदूक और हिंसा के बजाय विकास तथा सामान्य जीवन को प्राथमिकता देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि बस्तर के लोग शांति और विकास चाहते हैं और क्षेत्र में लंबे समय तक चले हिंसा के दौर के बाद उनकी प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं।
पत्रकार वार्ता में पीड़ितों ने विपक्षी नेताओं से अपील की कि वे दिल्ली में बैठकर बयान देने के बजाय बस्तर आकर नक्सली हिंसा से प्रभावित लोगों की स्थिति को प्रत्यक्ष रूप से देखें। पीड़ितों ने कहा कि उन्होंने नक्सली हिंसा की कीमत अपनी जान, शरीर और परिवारों के नुकसान के रूप में चुकाई है। उनका कहना था कि बंदूक के जरिए भय पैदा किया जा सकता है, लेकिन विश्वास कायम नहीं किया जा सकता।
बस्तर शांति समिति से जुड़े पीड़ितों ने कहा कि क्षेत्र की मौजूदा जरूरत शांति, सुरक्षा और विकास है। उन्होंने बस्तर के भविष्य को हिंसा और नक्सली गतिविधियों से अलग देखने की आवश्यकता पर जोर दिया। पत्रकार वार्ता के दौरान पीड़ितों ने पी. चिदंबरम के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान को अपने अनुभवों की कसौटी पर परखते हुए कांग्रेस से भी सवाल किए। उनके मुताबिक नक्सली हिंसा से प्रभावित परिवारों के अनुभव और नुकसान को राजनीतिक बहस में ध्यान में रखा जाना चाहिए।