अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, लखनऊ के तत्वावधान में बी.एन.के.बी. पी.जी. कॉलेज, अकबरपुर में आयोजित ग्रीष्मकालीन कार्यशाला ‘बोधि-पथ’ के चौथे दिन बौद्ध दर्शन में योग की भूमिका पर विस्तृत चर्चा की गई। कार्यक्रम में विषय विशेषज्ञों ने बौद्ध परंपरा में योग की अवधारणा, उसके दार्शनिक महत्व तथा वर्तमान समय में उसकी प्रासंगिकता पर अपने विचार साझा किए।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि एवं विषय विशेषज्ञ डॉ. राजेश उपाध्याय, डॉ. अनिल कुमार, डॉ. रवि कुमार, डॉ. आशीष कुमार चतुर्वेदी तथा विनय कुमार ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। मुख्य अतिथि एवं विषय विशेषज्ञ डॉ. राजेश उपाध्याय ने "बौद्ध दर्शन में योग विमर्श" विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि भगवान बुद्ध ने स्वयं योगिक साधनाओं का अभ्यास कर ज्ञान प्राप्त किया था। उन्होंने कहा कि बौद्ध दर्शन में योग केवल शारीरिक व्यायाम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चित्त की शुद्धि, आत्मबोध और निर्वाण की दिशा में आगे बढ़ने का माध्यम माना जाता है।
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अपने व्याख्यान में उन्होंने अष्टांगिक मार्ग के सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प तथा सम्यक समाधि जैसे सिद्धांतों के महत्व को भी विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि महायान बौद्ध परंपरा के योगाचार दर्शन में योगाभ्यास के माध्यम से चित्त की शुद्धि और आत्मज्ञान प्राप्त करने की अवधारणा को विशेष महत्व दिया गया है।
डॉ. उपाध्याय ने कहा कि आज के समय में बढ़ते तनाव, चिंता और अवसाद जैसी मानसिक चुनौतियों के बीच विपश्यना तथा माइंडफुलनेस जैसी बौद्ध ध्यान पद्धतियों को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्होंने इन पद्धतियों की उपयोगिता पर भी विस्तार से प्रकाश डाला।
कार्यशाला में कॉलेज के प्राध्यापक, कर्मचारी तथा बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। प्रतिभागियों ने विषय विशेषज्ञों के विचारों को गंभीरता से सुना और कार्यक्रम में सक्रिय सहभागिता निभाई।
कार्यशाला के अंत में सह-संयोजक डॉ. रवि कुमार ने सभी अतिथियों, विशेषज्ञों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर सुश्री सुमित्रा पटेल सहित कॉलेज परिवार के अनेक सदस्य उपस्थित रहे।