उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) की वर्ष 2010 की अपर निजी सचिव (एपीएस) भर्ती में भ्रष्टाचार की जांच कर रही सीबीआई ने आयोग की लगातार अनदेखी और सहयोग न मिलने पर जांच बंद करने की चेतावनी दी है।
>सीबीआई निदेशक प्रवीण सूद ने 26 मई को उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह को भेजे पत्र में स्पष्ट शब्दों में कहा कि आयोग ने बार-बार अनुरोध के बावजूद आवश्यक अनुमतियाँ और दस्तावेज़ मुहैया नहीं कराए। यदि 30 दिनों के भीतर स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो एजेंसी को जांच बंद करने का निर्णय लेना पड़ सकता है।
2018 में शुरू हुई थी जांच, अब तक अधर में
>सीबीआई ने यह जांच 4 सितंबर 2018 को उत्तर प्रदेश सरकार और 15 जनवरी 2019 को केंद्र सरकार के आदेश पर शुरू की थी। प्रारंभिक जांच में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत तीन अधिकारियों पर संलिप्तता के साक्ष्य मिले थे –
- तत्कालीन सिस्टम एनालिस्ट गिरीश गोयल
- अनुभाग अधिकारी विनोद कुमार सिंह
- समीक्षा अधिकारी लाल बहादुर पटेल
>लेकिन आज तक इन अधिकारियों के विरुद्ध आगे की कार्रवाई के लिए अनुमति नहीं दी गई। सीबीआई ने पहली बार 23 अगस्त 2021 को, और फिर 9 जून 2022 को अनुमति के लिए पत्र भेजा था। इसके बाद मार्च, अप्रैल और मई 2025 में भी कई रिमाइंडर भेजे गए, पर स्थिति जस की तस बनी रही।
सीबीआई का आरोप: अहम दस्तावेज अब भी लंबित
>भले ही कुछ दस्तावेज 15 जुलाई 2023, 21 अप्रैल 2024 और 1 जनवरी 2025 को साझा किए गए हों, लेकिन सीबीआई का कहना है कि मूल और अहम रिकॉर्ड अब भी नहीं मिले हैं। इससे न तो संदिग्धों से पूछताछ संभव हो पा रही है और न ही जांच आगे बढ़ पा रही है।
>सीबीआई ने मुख्य सचिव से व्यक्तिगत हस्तक्षेप की मांग की है और आग्रह किया है कि वह यूपीपीएससी अध्यक्ष को निर्देश दें कि बिना और देरी के सभी दस्तावेज़ और अनुमति दी जाए।
यूपीपीएससी का पक्ष: देरी तकनीकी कारणों से
>इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए यूपीपीएससी सचिव अशोक कुमार ने कहा कि आयोग सीबीआई को समय से दस्तावेज दे रहा है, लेकिन रिकॉर्ड की मात्रा अधिक होने के कारण फोटोकॉपी और क्रम संख्या देने में वक्त लग रहा है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि बचे हुए दस्तावेज जल्द ही दे दिए जाएंगे। वहीं, कर्मचारियों के खिलाफ जांच की अनुमति विचाराधीन है।
CBI पर बढ़ा दबाव: हाईकोर्ट में लंबित मामले
>CBI ने यह भी बताया कि एपीएस भर्ती से जुड़े कई मामले इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित हैं, जहां एजेंसी को समय-समय पर स्टेटस रिपोर्ट भी जमा करनी होती है। ऐसे में आयोग का रवैया न केवल जांच को बाधित कर रहा है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकता है।