वाराणसी, 15 जुलाई। धर्म और आस्था की नगरी काशी में भगवान जगन्नाथ के भक्तों का 14 दिनों का इंतजार गुरुवार को समाप्त हो गया। महाजलाभिषेक के बाद अनसर काल में विश्राम कर रहे भगवान जगन्नाथ के मंदिर के पट सुबह श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। दर्शन शुरू होते ही मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे और पूजा-अर्चना कर भगवान का आशीर्वाद लिया। इसके साथ ही 16 से 18 जुलाई तक आयोजित होने वाली काशी की ऐतिहासिक रथयात्रा की तैयारियां भी पूरी कर ली गई हैं।
धार्मिक परंपरा के अनुसार ज्येष्ठ पूर्णिमा पर महाजलाभिषेक के बाद भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा 14 दिनों तक अनसर काल में रहते हैं। इस अवधि में उन्हें अस्वस्थ माना जाता है और मंदिर के पट आम श्रद्धालुओं के लिए बंद रहते हैं। इस दौरान भगवान को औषधीय काढ़ा और विशेष भोग अर्पित किया जाता है।
आषाढ़ अमावस्या की सुबह करीब पांच बजे मंदिर के पट खोले गए। इस अवसर पर भगवान का सफेद वस्त्रों और सफेद पुष्पों से विशेष श्रृंगार किया गया। पंचामृत और परवल के रस का भोग लगाने के बाद विधि-विधान से आरती हुई। इसके बाद श्रद्धालुओं को दर्शन कराए गए और प्रसाद वितरित किया गया।
मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना के बाद भगवान जगन्नाथ की डोली रथयात्रा स्थल के लिए रवाना की जाएगी। 16 जुलाई से शुरू होने वाली तीन दिवसीय ऐतिहासिक रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा भव्य रथ पर विराजमान होकर श्रद्धालुओं को दर्शन देंगे।
हर वर्ष आयोजित होने वाली इस रथयात्रा में काशी ही नहीं बल्कि आसपास के जिलों और दूसरे राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस बार भी आयोजन में भारी भीड़ उमड़ने की संभावना है।
वाराणसी की जगन्नाथ रथयात्रा शहर की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में गिनी जाती है। रथयात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि काशी की सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। तीन दिनों तक चलने वाले इस आयोजन के दौरान श्रद्धालु भगवान के रथ के दर्शन करने और पूजा-अर्चना के लिए बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।
काशी का जगन्नाथ मंदिर लगभग ढाई सौ वर्ष से अधिक पुराना माना जाता है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार वर्ष 1765 के बाद पुरी से आए एक ब्रह्मचारी पुजारी ने यहां भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की प्रतिमाओं की स्थापना की थी। इसके बाद वर्ष 1768 में मंदिर का निर्माण शुरू हुआ, जो वर्ष 1790 में पूरा हुआ। मंदिर के निर्माण में छत्तीसगढ़ के भोंसले शासकों का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।
मंदिर में दर्शन शुरू होने के साथ ही रथयात्रा की तैयारियां भी अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। तीन दिवसीय आयोजन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आने की संभावना को देखते हुए व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है।