नेशनल ट्यूबरक्लोसिस इरेडिकशन के तहत केजीएमयू के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग में टीबी जांच सेवाओं को मजबूत करने के लिए ट्रूनॉट मशीन की स्थापना की गई है। विभागाध्यक्ष डॉ. सूर्यकान्त ने बताया कि ओएनजीसी के सीएसआर सहयोग से लखनऊ जनपद को चार नए मॉड्यूल ट्रूनॉट मशीनें उपलब्ध कराई गई हैं, जिनमें से एक मशीन अब रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के डॉट्स सेंटर में संचालित होगी। इससे टीबी मरीजों को जांच के लिए अन्य विभागों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
डॉ. सूर्यकान्त के अनुसार, यह मशीन लखनऊ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी और जिला क्षय रोग अधिकारी की ओर से उपलब्ध कराई गई है। उन्होंने जिला एवं राज्य क्षय रोग अधिकारियों, मुख्य चिकित्सा अधिकारी तथा उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य विभाग के प्रति आभार व्यक्त किया।
उन्होंने बताया कि अब तक टीबी मरीजों के बलगम के नमूनों को जांच के लिए माइक्रोबायोलॉजी विभाग भेजा जाता था। माइक्रोबायोलॉजी विभाग में लखनऊ के अलावा अन्य जिलों से भी बड़ी संख्या में सैंपल आने के कारण जांच का दबाव बना रहता था। नई मशीन लगने से रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग में ही जांच की सुविधा उपलब्ध हो सकेगी और मरीजों को रिपोर्ट शीघ्र मिल सकेगी।
विभाग में ट्रूनॉट मशीन का डेमोंस्ट्रेशन भी किया गया। डॉ. सूर्यकान्त ने बताया कि मशीन का संचालन सरल है और कोई भी स्वास्थ्य कार्यकर्ता पांच दिनों के भीतर इसका संचालन सीख सकता है। केजीएमयू की कुलपति डॉ. सोनिया नित्यानन्द ने रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग को बधाई देते हुए कहा कि अत्याधुनिक ट्रूनॉट मशीन टीबी, एमडीआर टीबी और गंभीर टीबी मरीजों की शीघ्र एवं सटीक जांच में उपयोगी सिद्ध होगी।
डेमोंस्ट्रेशन कार्यक्रम में विभाग के चिकित्सक डॉ. अंकित कुमार, सीनियर और जूनियर डॉक्टर, डॉट्स सेंटर के स्वास्थ्य कार्यकर्ता तथा एमइएलए परियोजना की टीम मौजूद रही। परियोजना से जुड़े ऑस्ट्रेलिया मूल के कैथरीन डेलोनी और थोमस डेलोनी भी कार्यक्रम में शामिल हुए। बताया गया कि डीइवीआई संस्थान के माध्यम से उन्होंने कोविड-19 महामारी से लेकर वर्तमान में टीबी मरीजों के उपचार और देखभाल तक विभिन्न स्तरों पर सहयोग प्रदान किया है।
डॉ. सूर्यकान्त ने कहा कि टीबी मुक्त भारत अभियान को सफल बनाने में सामाजिक संस्थाओं, जनजागरूकता और सामुदायिक सहभागिता की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने अधिकारियों और स्वास्थ्यकर्मियों से नई ट्रूनॉट मशीनों के सुचारु संचालन एवं नियमित रखरखाव सुनिश्चित करने का आग्रह किया।
उन्होंने बताया कि अत्याधुनिक ट्रूनॉट मशीन की मदद से टीबी रोग की शीघ्र और सटीक जांच संभव होगी तथा मरीजों को उसी दिन रिपोर्ट मिल सकेगी। इससे एमडीआर टीबी और गंभीर टीबी मरीजों के समय पर उपचार में सहायता मिलेगी।
डॉ. सूर्यकान्त ने कहा कि केवल एक्स-रे में दिखाई देने वाले धब्बों के आधार पर टीबी की दवा शुरू करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा, “हर चमकी हुई चीज सोना नहीं होती, उसी प्रकार एक्स-रे का हर धब्बा टीबी नहीं होता।” उनके अनुसार, ट्रूनॉट मशीन के माध्यम से सटीक जांच मिलने से मरीजों को अनावश्यक उपचार से बचाया जा सकेगा।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के टीबी मुक्त भारत अभियान को सफल बनाने में आधुनिक जांच तकनीकों की अहम भूमिका है। उन्होंने जानकारी दी कि अब तक 500 से अधिक टीबी मरीजों को गोद लिया जा चुका है। साथ ही एक गांव और एक स्लम एरिया को वर्ष 2019 से गोद लिया गया है। केजीएमयू की ओर से लगभग 15 ग्राम पंचायतों को भी गोद लिया जा चुका है।