लखनऊ सेंट्रल बार चुनाव विवाद में बड़ी कार्रवाई, अध्यक्ष- महामंत्री का पंजीकरण निलंबित

09 Sep 2026

लखनऊ। लखनऊ सेंट्रल बार एसोसिएशन के चुनाव को लेकर चल रहा विवाद अब अनुशासनात्मक कार्रवाई तक पहुंच गया है। उत्तर प्रदेश बार काउंसिल ने सेंट्रल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अखिलेश जायसवाल और महामंत्री अवनीश दीक्षित का अधिवक्ता पंजीकरण तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। दोनों पदाधिकारियों को नोटिस जारी कर उनका पक्ष मांगा गया है।

बार काउंसिल ने मामले को विस्तृत जांच और आगे की अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए अपनी अनुशासन समिति को भेज दिया है। यह विवाद सेंट्रल बार एसोसिएशन के आगामी चुनाव की प्रक्रिया और चुनाव की निगरानी को लेकर सामने आया है।

जानकारी के अनुसार, सेंट्रल बार एसोसिएशन के आगामी चुनाव को लेकर मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ तक पहुंचा था। चुनावी प्रक्रिया को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने के लिए न्यायालय के निर्देश पर वरिष्ठ अधिवक्ताओं की एक एल्डर्स कमेटी गठित की गई।

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एल्डर्स कमेटी का उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया को आगे बढ़ाना और चुनाव संपन्न कराने के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं करना था। इसके बाद उत्तर प्रदेश बार काउंसिल भी चुनाव की प्रक्रिया और उसकी निगरानी को लेकर सक्रिय हुई। चुनाव से संबंधित व्यवस्थाओं को लेकर आगे की प्रक्रिया में बार काउंसिल और सेंट्रल बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों के बीच मतभेद सामने आने लगे।

चुनाव को नियमों के अनुसार और पारदर्शी तरीके से कराने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश बार काउंसिल ने पांच सदस्यों की एक पर्यवेक्षक समिति नियुक्त करने का निर्णय लिया। इस समिति की भूमिका चुनाव प्रक्रिया पर नजर रखने और यह सुनिश्चित करने की बताई गई कि चुनाव निर्धारित नियमों और प्रक्रिया के तहत कराया जाए।

हालांकि, इसी व्यवस्था को लेकर सेंट्रल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और महामंत्री तथा बार काउंसिल के बीच विवाद की स्थिति पैदा हुई। बार काउंसिल का आरोप है कि सेंट्रल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अखिलेश जायसवाल और महामंत्री अवनीश दीक्षित ने काउंसिल की ओर से की गई इस व्यवस्था को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

विवाद उस समय और बढ़ गया जब सेंट्रल बार एसोसिएशन की आमसभा बुलाकर बार काउंसिल की ओर से लिए गए निर्णय को खारिज किए जाने का आरोप सामने आया। उत्तर प्रदेश बार काउंसिल ने इस घटनाक्रम को गंभीरता से लिया। काउंसिल के अनुसार, उसके आदेश और चुनाव प्रक्रिया से संबंधित व्यवस्था को इस तरह अस्वीकार करना नियमों और अनुशासन का उल्लंघन है।

बार काउंसिल ने दोनों पदाधिकारियों के आचरण को गंभीर पेशेवर कदाचार और अनुशासनहीनता की श्रेणी में माना है। इसी आधार पर दोनों के खिलाफ तत्काल प्रभाव से कार्रवाई की गई। हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष जांच की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।

उत्तर प्रदेश बार काउंसिल की कार्रवाई के तहत सेंट्रल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अखिलेश जायसवाल और महामंत्री अवनीश दीक्षित का अधिवक्ता पंजीकरण तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया है। दोनों को नोटिस जारी कर मामले में अपना पक्ष रखने और लगाए गए आरोपों का जवाब देने के लिए कहा गया है। पंजीकरण निलंबन के बाद दोनों पदाधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। मामले को बार काउंसिल की अनुशासन समिति को सौंप दिया गया है।

अब मामले की जांच उत्तर प्रदेश बार काउंसिल की अनुशासन समिति करेगी। समिति चुनाव से जुड़े दस्तावेजों, बार काउंसिल के आदेशों और सेंट्रल बार एसोसिएशन की ओर से लिए गए फैसलों की जांच करेगी।

जांच के दौरान यह देखा जाएगा कि क्या संबंधित पदाधिकारियों की ओर से बार काउंसिल के आदेशों का उल्लंघन किया गया था और क्या उनका आचरण पेशेवर अनुशासन के निर्धारित दायरे के अनुरूप था। दोनों पदाधिकारियों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाएगा। इसके बाद जांच समिति अपनी रिपोर्ट और सिफारिश प्रस्तुत करेगी। आगे की कार्रवाई इसी प्रक्रिया के आधार पर तय होगी।

मौजूदा कार्रवाई केवल तत्काल निलंबन तक सीमित नहीं है। बार काउंसिल की ओर से दोनों पदाधिकारियों से जवाब मांगा गया है और जांच के परिणाम के आधार पर आगे की अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो दोनों के खिलाफ अधिक कठोर कार्रवाई भी हो सकती है। इसमें अधिवक्ता पंजीकरण को स्थायी रूप से निरस्त करने तक की कार्रवाई शामिल हो सकती है। हालांकि, इस संबंध में अंतिम निर्णय जांच पूरी होने और संबंधित पदाधिकारियों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए जाने के बाद ही लिया जाएगा।

पूरे मामले का केंद्र सेंट्रल बार एसोसिएशन के आगामी चुनाव की प्रक्रिया है। एक तरफ चुनाव को लेकर न्यायालय के निर्देश के तहत एल्डर्स कमेटी गठित की गई, वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश बार काउंसिल ने चुनाव की निगरानी के लिए पांच सदस्यीय पर्यवेक्षक समिति बनाने का निर्णय लिया। बार काउंसिल और सेंट्रल बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों के बीच इसी चुनावी व्यवस्था को लेकर मतभेद सामने आए।

बार काउंसिल का आरोप है कि उसके निर्णय को स्वीकार नहीं किया गया और आमसभा के जरिए उसे खारिज किया गया। इसी घटनाक्रम को आधार बनाकर दोनों पदाधिकारियों के खिलाफ पेशेवर कदाचार और अनुशासनहीनता से संबंधित कार्रवाई की गई है।

इस कार्रवाई के बाद सेंट्रल बार एसोसिएशन के आगामी चुनाव की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण हो गई है। एल्डर्स कमेटी की भूमिका, पांच सदस्यीय पर्यवेक्षक समिति की जिम्मेदारी और चुनाव की आगे की प्रक्रिया पर अब नजर रहेगी। चुनाव किस प्रक्रिया के तहत और किस समय कराया जाएगा, यह आगे होने वाली कार्रवाई से स्पष्ट होगा।

वहीं, अध्यक्ष और महामंत्री के खिलाफ शुरू हुई अनुशासनात्मक जांच भी मामले का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जांच समिति संबंधित दस्तावेजों और दोनों पक्षों के रुख के आधार पर मामले की समीक्षा करेगी।

लखनऊ सेंट्रल बार एसोसिएशन राजधानी के अधिवक्ताओं का प्रमुख संगठन है। ऐसे में संगठन के अध्यक्ष और महामंत्री के अधिवक्ता पंजीकरण के निलंबन की कार्रवाई के बाद अधिवक्ता समुदाय में इस मामले को लेकर चर्चा बढ़ गई है। अब नजर अनुशासन समिति की जांच और उसके बाद होने वाली कार्रवाई पर है। साथ ही, सेंट्रल बार एसोसिएशन के चुनाव की प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ती है, यह भी महत्वपूर्ण रहेगा।