पांच दिन कैमरे के सामने ‘कैद’, फिर ₹1.30 करोड़ ट्रांसफर; लखनऊ में डिजिटल अरेस्ट

23 Aug 2026

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में साइबर ठगी के दो मामलों में दो बुजुर्गों से करीब 1.30 करोड़ रुपये ठगे जाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि साइबर जालसाजों ने खुद को एटीएस, सीबीआई, ईडी और दिल्ली पुलिस का अधिकारी बताकर दोनों पीड़ितों को जांच और गिरफ्तारी का डर दिखाया।

पुलिस के अनुसार, दोनों मामलों में पीड़ितों को कई दिनों तक वीडियो कॉल से जोड़े रखा गया। आरोपियों ने जांच, मनी लॉन्ड्रिंग और गिरफ्तारी वारंट का हवाला देकर पैसे ट्रांसफर करने के लिए दबाव बनाया। एक मामले में 75 वर्षीय महिला ने अपनी तीन एफडी तुड़वाकर 78.50 लाख रुपये ट्रांसफर किए, जबकि दूसरे मामले में 69 वर्षीय रिटायर्ड मर्चेंट नेवी कैप्टन से 52 लाख रुपये लिए गए। दोनों मामलों में अतिरिक्त रकम की मांग होने के बाद पीड़ितों को ठगी का शक हुआ। इसके बाद मामला साइबर क्राइम पुलिस तक पहुंचा।

पहला मामला इंदिरानगर के रवींद्रपल्ली का है। यहां रहने वाली 75 वर्षीय रत्ना कौल को जालसाजों ने वॉट्सऐप कॉल किया। फोन करने वाले ने खुद को एटीएस अधिकारी बताया।

यह खबर भी पढ़े - हर ब्लॉक में टीएलएम मेला, शिक्षा चौपाल से निपुण भारत मिशन को मिलेगा विस्तार

आरोपियों ने महिला से कहा कि उनके आधार कार्ड का इस्तेमाल मुंबई के एक बैंक खाते में किया जा रहा है। इसके बाद उस कथित बैंक खाते को अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग से जोड़ते हुए उन्हें जांच में फंसने का डर दिखाया गया। महिला को यह भी कहा गया कि यदि उन्होंने जांच में सहयोग नहीं किया तो सीबीआई उन्हें गिरफ्तार कर सकती है और उन्हें मुंबई जेल भेजा जा सकता है।

आरोप है कि जालसाजों ने महिला को किसी अन्य व्यक्ति से संपर्क नहीं करने को कहा और वीडियो कॉल के जरिए निगरानी बनाए रखी। इस दौरान डर के कारण महिला ने अपनी तीन एफडी तुड़वा दीं

इसके बाद उन्होंने जालसाजों के बताए बैंक खातों में कुल 78.50 लाख रुपये ट्रांसफर कर दिए। रकम भेजने के बाद भी ठगी का सिलसिला नहीं रुका और आरोपियों की ओर से आगे और धन की मांग की गई। अतिरिक्त रकम मांगे जाने पर महिला को संदेह हुआ। इसके बाद उन्होंने मामले की जानकारी साइबर अपराध पुलिस को दी।

यह खबर भी पढ़े - यूपी में 332 नायब तहसीलदार बने तहसीलदार, कई जिलों में नई तैनाती

दूसरा मामला गोमतीनगर के विश्वासखंड का है। यहां रहने वाले 69 वर्षीय रिटायर्ड मर्चेंट नेवी कैप्टन मोहन लाल आहूजा को भी इसी तरह निशाना बनाया गया।

जानकारी के अनुसार, शुरुआत में जालसाज ने खुद को दिल्ली पुलिस का इंस्पेक्टर बताया। उसने दावा किया कि आहूजा के पहचान पत्र पर जारी सिम और डेबिट कार्ड का इस्तेमाल अवैध गतिविधियों में हो रहा है।

इसके बाद एटीएस पुणे और ईडी अधिकारियों के नाम से उनसे संपर्क किया गया। आरोपियों ने उन्हें बताया कि उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुका है।

यह खबर भी पढ़े - लखनऊ में हाईकोर्ट के निजी सचिव के बंद घर में लाखों की चोरी, दो संदिग्ध कैमरे में कैद

आहूजा उस समय सिक्किम से लखनऊ लौट रहे थे। आरोप है कि जालसाजों ने उन्हें करीब पांच दिनों तक वीडियो कॉल पर जोड़े रखा। इस दौरान जांच और कथित ‘सिक्योरिटी डिपॉजिट’ के नाम पर उनसे अलग-अलग बैंक खातों में रकम ट्रांसफर कराई गई। कुल मिलाकर 52 लाख रुपये जालसाजों के बताए खातों में भेजे गए। बाद में आरोपियों ने उनसे और रकम की मांग की। इसी बिंदु पर उन्हें ठगी का शक हुआ और मामला पुलिस तक पहुंचा।

साइबर क्राइम थाने के इंस्पेक्टर आलोक राव के मुताबिक, दोनों मामलों में गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है। पुलिस ने जिन बैंक खातों में रकम ट्रांसफर की गई, उन्हें फ्रीज कराने के लिए संबंधित बैंकों से संपर्क किया है। जांच में बैंक लेनदेन, खातों से जुड़े विवरण और आरोपियों के डिजिटल सुरागों की पड़ताल की जा रही है।

पुलिस दोनों मामलों में साइबर अपराधियों तक पहुंचने और रकम के लेनदेन की कड़ियों की जांच कर रही है। दोनों मामलों में आरोपियों की कार्यप्रणाली में कई समानताएं सामने आई हैं। पहले पीड़ितों से किसी सरकारी या जांच एजेंसी के अधिकारी के रूप में संपर्क किया गया।

इसके बाद पहचान पत्र, सिम कार्ड, बैंक खाते, मनी लॉन्ड्रिंग और कथित अवैध गतिविधियों का हवाला देकर भय का माहौल बनाया गया। इसके बाद गिरफ्तारी वारंट और जांच प्रक्रिया का डर दिखाकर पीड़ितों पर पैसे ट्रांसफर करने का दबाव बनाया गया।

दोनों मामलों में वीडियो कॉल का इस्तेमाल भी किया गया। पीड़ितों को लंबे समय तक कॉल पर बनाए रखने और दूसरे लोगों से संपर्क न करने की हिदायत दिए जाने का आरोप है।

इन मामलों में साइबर ठगों ने एटीएस, सीबीआई, ईडी और दिल्ली पुलिस जैसी एजेंसियों के नाम का इस्तेमाल किया। पीड़ितों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की गई कि वे किसी गंभीर कानूनी जांच में फंस चुके हैं।

ऐसे मामलों में वीडियो कॉल के जरिए पीड़ित को लगातार संपर्क में बनाए रखना ठगी की प्रक्रिया का हिस्सा बताया गया है। यहां भी दोनों पीड़ितों से तत्काल रकम ट्रांसफर करने की मांग की गई और अतिरिक्त पैसे मांगे जाने के बाद उन्हें संदेह हुआ।

‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम से होने वाली साइबर ठगी में जालसाज आम तौर पर खुद को पुलिस या किसी जांच एजेंसी का अधिकारी बताते हैं। इसके बाद पीड़ित को किसी कथित अपराध, बैंक खाते, मोबाइल नंबर या पहचान पत्र से जुड़ी जांच का डर दिखाया जाता है।

लखनऊ के इन दोनों मामलों में भी आरोपियों ने इसी तरीके से सरकारी और जांच एजेंसियों के नाम का इस्तेमाल किया। एक पीड़िता से एफडी तुड़वाकर रकम ट्रांसफर कराई गई, जबकि दूसरे मामले में कथित सुरक्षा जमा और जांच के नाम पर रकम मांगी गई।

मामले की जानकारी सामने आने के बाद पुलिस की ओर से लोगों से सतर्क रहने की अपील की गई है। किसी भी व्यक्ति को पुलिस, सीबीआई, ईडी या एटीएस के नाम से वीडियो कॉल पर जांच या गिरफ्तारी के नाम पर पैसे ट्रांसफर करने की मांग की जाए तो ऐसी स्थिति में सतर्क रहने की जरूरत है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को ऐसा संदिग्ध कॉल आता है तो वह कॉल काटकर परिवार के सदस्यों या भरोसेमंद लोगों को इसकी जानकारी दे सकता है। साइबर ठगी की स्थिति में 1930 पर संपर्क करने की सलाह दी गई है।

लखनऊ के इन दो मामलों में सामने आई रकम को जोड़ने पर कुल 1.30 करोड़ रुपये बनते हैं। पहले मामले में 78.50 लाख रुपये और दूसरे मामले में 52 लाख रुपये ट्रांसफर किए गए। पुलिस ने दोनों मामलों में मुकदमा दर्ज कर बैंक खातों और डिजिटल सुरागों की जांच शुरू कर दी है। जांच के दौरान रकम के लेनदेन और आरोपियों से जुड़े अन्य डिजिटल साक्ष्यों की पड़ताल की जा रही है।