>उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के 88 गांवों में भूगर्भीय जल स्तर इतना नीचे चला गया है कि अब पीने के पानी की आपूर्ति संकट में है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने इस गंभीर समस्या पर चिंता जताते हुए राज्य सरकार के तीन प्रमुख विभागों जल निगम, सिंचाई विभाग और केंद्रीय जल आयोग को मिलकर ठोस समाधान तैयार करने का आदेश दिया है।
>यह मामला उत्कर्ष सेवा संस्थान द्वारा वर्ष 2016 में दायर जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें राजधानी के ग्रामीण इलाकों में लगातार बढ़ रही पेयजल समस्या को उठाया गया था।
>सुनवाई के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये जल निगम के प्रबंध निदेशक रमाकांत पांडेय ने कोर्ट को बताया कि लखनऊ जिले के 88 गांवों में पीने योग्य पानी के लिए पर्याप्त भूगर्भ जल उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों में जल स्तर इतना नीचे चला गया है कि हैंडपंप और बोरवेल भी सूखने लगे हैं।
>न्यायमूर्ति राजन राय और राजीव भारती की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि पानी की कमी केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय चुनौती भी है। अदालत ने तीनों विभागों को निर्देश दिया कि वे एक संयुक्त योजना बनाकर इस समस्या का स्थायी समाधान निकालें। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख 5 जनवरी 2026 तय की है।
>याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता मोतीलाल यादव ने अदालत को बताया कि लखनऊ के कई गांवों में नल योजना और पाइपलाइन से भी पानी की नियमित आपूर्ति नहीं हो पा रही। गर्मी के मौसम में लोगों को दूर-दराज़ इलाकों से पानी लाना पड़ता है। इस पर अदालत ने कहा कि यह स्थिति नागरिकों के मूल अधिकार “स्वच्छ पेयजल के अधिकार” का उल्लंघन है।