नागपंचमी पर फीकी पड़ी गांव की रौनक, तस्वीरों में दिखी बदलती परंपराओं की झलक

18 Aug 2026

अंबेडकरनगर: नागपंचमी का त्योहार ग्रामीण इलाकों में लंबे समय से धार्मिक परंपराओं के साथ-साथ सामूहिक मेल-मिलाप और उत्सव का अवसर भी रहा है। गांवों में इस दिन बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक त्योहार के माहौल में शामिल होते थे। हालांकि, बदलते समय के साथ इस पर्व को मनाने के तौर-तरीकों में भी बदलाव दिखाई देने लगा है।

अंबेडकरनगर से सामने आई तस्वीरें नागपंचमी के इसी बदलते स्वरूप की झलक दिखाती हैं। त्योहार के मौके पर बच्चों के बीच उत्सव की छोटी-सी खुशी जरूर नजर आई, लेकिन गांव की वह व्यापक चहल-पहल और सामूहिकता कम दिखाई दी, जिसे कभी नागपंचमी की पहचान माना जाता था।

ग्रामीण क्षेत्रों में नागपंचमी केवल एक धार्मिक पर्व तक सीमित नहीं रही है। यह गांव के लोगों के एक साथ जुटने और सामाजिक मेल-जोल का भी अवसर रही है। त्योहार के दौरान जगह-जगह झूले लगते थे। बच्चों में खास उत्साह दिखाई देता था। गांव की बेटियां और बहनें गुड़िया सेरवाने जाती थीं। तालाबों और नहरों के किनारे लोगों की भीड़ जुटती थी। बच्चों की खिलखिलाहट और पारंपरिक गतिविधियां त्योहार के माहौल को अलग रंग देती थीं। ऐसे अवसरों पर गांव के अलग-अलग परिवार और समुदाय एक साझा उत्सव का हिस्सा बनते थे। इससे त्योहार केवल एक दिन की धार्मिक गतिविधि न रहकर गांव की सामाजिक जिंदगी का भी हिस्सा बन जाता था।

समय के साथ ग्रामीण जीवनशैली में कई बदलाव आए हैं। इन बदलावों का असर स्थानीय त्योहारों की परंपराओं पर भी दिखाई देता है। नागपंचमी के मामले में भी वही तस्वीर सामने आ रही है। रस्में अब भी मौजूद हैं, लेकिन पहले जैसी सामूहिक भागीदारी और उत्सव का विस्तार कई जगह कम होता नजर आता है। जहां कभी पूरे गांव में त्योहार का माहौल दिखाई देता था, वहीं अब इसकी झलक सीमित स्तर पर दिखाई देने लगी है। अंबेडकरनगर की तस्वीरों में बच्चों के बीच दिखाई दे रही खुशी इसी बदलते परिवेश का एक दृश्य प्रस्तुत करती है। यह खुशी मौजूद है, लेकिन उसके आसपास वह व्यापक उत्सवी माहौल नजर नहीं आता, जो ग्रामीण नागपंचमी के पुराने स्वरूप की खासियत रहा है।

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त्योहार की बदलती तस्वीर के बावजूद बच्चों के चेहरे पर दिखाई देने वाली खुशी इस पर्व की परंपरा से जुड़ी भावना को सामने लाती है। बच्चों के बीच मौजूद यह छोटी-सी खुशी उन पुराने दिनों की याद दिलाती है, जब नागपंचमी के मौके पर गांव के सार्वजनिक स्थान उत्सव का केंद्र बन जाते थे। बच्चों के लिए झूले, खेल और मेल-जोल त्योहार की खास पहचान हुआ करते थे। परिवारों के लिए यह एक-दूसरे से मिलने और साथ समय बिताने का अवसर होता था। ग्रामीण समाज में ऐसे त्योहार सामाजिक रिश्तों को मजबूत करने वाले अवसरों के रूप में भी देखे जाते रहे हैं।

किसी त्योहार की तस्वीर केवल उस दिन की गतिविधि नहीं दिखाती, बल्कि वह उस समाज में हो रहे बदलावों की झलक भी देती है। नागपंचमी से जुड़ी ये तस्वीरें भी ग्रामीण जीवन में बदलती प्राथमिकताओं और उत्सव के बदलते स्वरूप को सामने रखती हैं। एक तरफ परंपरा अभी भी दिखाई देती है, दूसरी तरफ उसका सामूहिक रूप सीमित होता नजर आता है। यही अंतर पुराने और मौजूदा त्योहार के माहौल में सबसे स्पष्ट दिखाई देता है। कभी जिस पर्व में गांव के अलग-अलग हिस्सों से लोग शामिल होते थे, अब उसकी गतिविधियां कम दायरे में दिखाई पड़ सकती हैं। तस्वीरों में बच्चों की मौजूदगी यह बताती है कि उत्सव की भावना खत्म नहीं हुई है, लेकिन उसके आयोजन और सामाजिक स्वरूप में बदलाव जरूर दिखाई दे रहा है।

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ग्रामीण त्योहारों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सामूहिकता रही है। जब एक पर्व घर से निकलकर पूरे गांव का उत्सव बनता है, तो वह स्थानीय संस्कृति और सामाजिक परंपराओं का हिस्सा बन जाता है। नागपंचमी के साथ भी ऐसी ही अनेक परंपराएं जुड़ी रही हैं। झूले, गुड़िया सेरवाना, तालाब और नहर किनारे जुटना तथा बच्चों का सामूहिक उत्साह इस पर्व के पुराने सामाजिक स्वरूप को दर्शाते हैं। अब जब त्योहार का सामूहिक रूप कई जगह कम दिखाई दे रहा है, तो इन परंपराओं के भविष्य को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। उपलब्ध तस्वीरें किसी एक परिवार या एक स्थान से आगे बढ़कर ग्रामीण त्योहारों के बदलते स्वरूप की ओर संकेत करती हैं।

परंपराएं केवल धार्मिक अनुष्ठानों से नहीं बचतीं। उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए सामाजिक भागीदारी और सामूहिक अनुभव भी जरूरी होते हैं। नागपंचमी जैसे त्योहारों से जुड़ी कई ग्रामीण परंपराएं बच्चों और युवाओं के बीच सामूहिक रूप से अनुभव की जाती रही हैं। जब ऐसी गतिविधियां सीमित होती हैं, तो नई पीढ़ी का उनसे सीधा जुड़ाव भी कम हो सकता है। अंबेडकरनगर में बच्चों की तस्वीर इसी बदलाव के बीच त्योहार की बची हुई खुशी को दिखाती है। हालांकि, साथ ही यह तस्वीर उन परंपराओं की याद भी दिलाती है, जो कभी गांव की रोजमर्रा की जिंदगी में अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देती थीं।