लखनऊ। प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना पारंपरिक कारीगरों और हस्तशिल्पकारों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई केंद्र सरकार की पहल है। योजना के दायरे में हाथों और औजारों से काम करने वाले कई पारंपरिक व्यवसायों को शामिल किया गया है। इसके तहत पात्र कारीगरों को कौशल प्रशिक्षण, आधुनिक औजारों के लिए सहायता और रियायती दर पर ऋण जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।
इस योजना का उद्देश्य पारंपरिक हुनर से जुड़े लोगों को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ना और उनके उत्पादों की गुणवत्ता तथा बाजार तक पहुंच को बढ़ाना है। योजना ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में पारंपरिक व्यवसाय करने वाले पात्र परिवारों के लिए लागू है। देश में लंबे समय से बढ़ई, लोहार, कुम्हार, सुनार, दर्जी, नाई, धोबी और अन्य पारंपरिक कामगार अपने हुनर के जरिए लोगों की जरूरतें पूरी करते रहे हैं। हालांकि, पारंपरिक व्यवसायों से जुड़े कई कामगारों के सामने आधुनिक औजारों, नई तकनीक और वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता से जुड़ी चुनौतियां रहती हैं।
प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के जरिए ऐसे पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों को प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरण और ऋण की सुविधा देने का प्रावधान बताया गया है। इसका उद्देश्य उनके कौशल को बेहतर बनाने और पारंपरिक काम को आधुनिक तकनीक के साथ आगे बढ़ाने में सहायता करना है। योजना के तहत पात्र लाभार्थियों को कौशल प्रशिक्षण के साथ आधुनिक टूलकिट खरीदने के लिए सहायता भी दी जाती है। इसके अलावा कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए रियायती ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराने का प्रावधान है।
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प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के तहत ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में किए जाने वाले 18 पारंपरिक व्यवसायों को शामिल किया गया है। इनमें हाथों और औजारों से काम करने वाले अलग-अलग प्रकार के कारीगर और शिल्पकार आते हैं। योजना के दायरे में आने वाले व्यवसायों में लोहार, सुनार, कुम्हार, बढ़ई या सुतार, मूर्तिकार और पत्थर तराशने वाले, मोची या जूता बनाने वाले, दर्जी, नाई, धोबी और मालाकार शामिल हैं। इसके अलावा अस्त्रकार, ताला बनाने वाले, हथौड़ा और टूलकिट निर्माता, नाव निर्माता, टोकरी, मैट और झाड़ू बनाने वाले, गुड़िया एवं खिलौना निर्माता, राजमिस्त्री तथा मछली का जाल बनाने वाले भी योजना के तहत शामिल हैं।
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इस तरह योजना का दायरा अलग-अलग पारंपरिक कौशल और व्यवसायों से जुड़े कामगारों तक रखा गया है। योजना का लाभ लेने के लिए आवेदक का हाथों और औजारों से काम करने वाला पारंपरिक कारीगर या शिल्पकार होना जरूरी है। उसे स्वरोजगार के आधार पर योजना में शामिल पारंपरिक व्यवसायों में से किसी एक से जुड़ा होना चाहिए। पात्रता से जुड़ी प्रमुख शर्तें इस प्रकार हैं:
- आवेदक की उम्र कम से कम 18 वर्ष होनी चाहिए।
- आवेदक हाथों और औजारों से काम करने वाला पारंपरिक कारीगर या शिल्पकार होना चाहिए।
- आवेदक का व्यवसाय योजना में शामिल 18 पारंपरिक व्यवसायों में से एक होना चाहिए।
- एक परिवार से केवल एक सदस्य योजना का लाभ उठा सकता है। परिवार में पति, पत्नी और अविवाहित बच्चों को शामिल माना गया है।
- आवेदक ने पिछले पांच वर्षों में केंद्र या राज्य सरकार की किसी समान ऋण आधारित योजना के तहत ऋण नहीं लिया होना चाहिए। इसमें प्रधानमंत्री स्वनिधि और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम जैसी योजनाओं का उल्लेख किया गया है।
- आवेदक के परिवार का कोई सदस्य सरकारी सेवा में कार्यरत नहीं होना चाहिए।
इन शर्तों के आधार पर पात्रता निर्धारित की जाती है।

प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के तहत पात्र लाभार्थियों को कई प्रकार की सुविधाएं देने का प्रावधान है। इनमें पहचान, प्रशिक्षण, टूलकिट सहायता और ऋण प्रमुख हैं। योजना के तहत लाभार्थियों को एक आधिकारिक पहचान पत्र और डिजिटल प्रमाणपत्र उपलब्ध कराया जाता है। इससे योजना के तहत लाभार्थी की पहचान और उसके पारंपरिक व्यवसाय से संबंधित जानकारी को दर्ज किया जाता है।
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लाभार्थियों को कौशल से संबंधित प्रशिक्षण दिया जाता है। बुनियादी प्रशिक्षण की अवधि 5 से 7 दिन बताई गई है। इसके अलावा इच्छुक उम्मीदवारों के लिए 15 दिन या उससे अधिक अवधि का उन्नत प्रशिक्षण भी उपलब्ध कराया जाता है। प्रशिक्षण का उद्देश्य संबंधित कारीगरों के कौशल को और बेहतर बनाना है।
कौशल प्रशिक्षण के दौरान लाभार्थियों को प्रतिदिन 500 रुपये का वजीफा दिए जाने का प्रावधान है। यह राशि प्रशिक्षण अवधि के दौरान लाभार्थी को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने से जुड़ी है। योजना में आधुनिक औजार खरीदने के लिए 15 हजार रुपये की ई-वाउचर या अनुदान राशि का प्रावधान बताया गया है। इसका इस्तेमाल कारीगर अपने काम से जुड़े आधुनिक औजार खरीदने के लिए कर सकते हैं।
योजना के तहत पात्र लाभार्थियों को बिना किसी गारंटी के कुल 3 लाख रुपये तक का ऋण उपलब्ध कराया जाता है। इस ऋण पर 5 प्रतिशत की रियायती ब्याज दर बताई गई है। ऋण की सुविधा का उद्देश्य पारंपरिक काम से जुड़े कारीगरों को अपने व्यवसाय के लिए वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराना है। योजना के तहत प्रत्येक डिजिटल लेनदेन पर 1 रुपये का प्रोत्साहन दिए जाने की जानकारी दी गई है। यह सुविधा डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने से जुड़ी है।
योजना के लिए आवेदन करते समय आवेदक को अपनी पहचान, बैंक खाते और परिवार से संबंधित जरूरी जानकारी उपलब्ध करानी होती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्रमुख दस्तावेजों में शामिल हैं:
- आधार कार्ड, जो मोबाइल नंबर से लिंक होना चाहिए।
- बैंक खाते की जानकारी।
- बैंक पासबुक और आईएफएससी कोड।
- मोबाइल नंबर।
- राशन कार्ड, परिवार के सत्यापन के लिए।
- जाति या श्रेणी प्रमाणपत्र, यदि लागू हो।
- संबंधित पारंपरिक व्यवसाय और कौशल का विवरण।
आवेदन से पहले इन दस्तावेजों और जानकारियों को तैयार रखना प्रक्रिया को पूरा करने में उपयोगी हो सकता है।
योजना में पंजीकरण के लिए आवेदक को अपने नजदीकी कॉमन सर्विस सेंटर यानी सीएससी पर जाना होगा। वहां आधार कार्ड और बैंक खाते से संबंधित जानकारी के साथ बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण कराया जाता है। इसके लिए फिंगरप्रिंट के जरिए पहचान का सत्यापन किया जाता है। इसके बाद सीएससी ऑपरेटर के माध्यम से प्रधानमंत्री विश्वकर्मा के आधिकारिक पोर्टल पर आवेदन फॉर्म भरा जाता है। आवेदन के लिए पोर्टल का पता pmvishwakarma.gov.in बताया गया है।
फॉर्म में आवेदक की व्यक्तिगत जानकारी के साथ उसके व्यवसाय और बैंक खाते से संबंधित विवरण दर्ज किए जाते हैं। आवेदन जमा होने के बाद इसकी जांच तीन चरणों में की जाती है। सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद पात्र लाभार्थी को प्रधानमंत्री विश्वकर्मा डिजिटल आईडी जारी की जाती है। इसके बाद प्रशिक्षण और ऋण से जुड़ी प्रक्रिया आगे बढ़ती है।