उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले निषाद आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है। उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद ने लखनऊ में आयोजित पार्टी के 11वें स्थापना दिवस समारोह में भारतीय जनता पार्टी को लेकर कड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि यदि निषाद समाज की मांगों को नहीं माना गया तो भाजपा को भी सत्ता से बाहर होना पड़ सकता है।
हजारों कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में दिए गए अपने संबोधन में संजय निषाद ने निषाद समाज की आरक्षण संबंधी मांग को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ाने का संकेत दिया। उन्होंने यह भी कहा कि उनके लिए मंत्री पद से ज्यादा महत्वपूर्ण अपने समाज के हितों की पैरवी करना है। इसी दौरान उन्होंने सरकार से असहमति होने की स्थिति में मंत्री पद वापस लेने की पेशकश भी की।
लखनऊ के कार्यक्रम में संजय निषाद ने अपने संबोधन के दौरान निषाद समाज की राजनीतिक भूमिका और आरक्षण की मांग का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जिन राजनीतिक दलों ने पहले निषाद समाज की आरक्षण संबंधी मांगों को नजरअंदाज किया, उन्हें सत्ता से बाहर होना पड़ा। संजय निषाद ने कहा, "निषाद समाज एक ऐसी राजनीतिक शक्ति है जिसकी अपील को जिसने भी नजरअंदाज किया, उसे जनता ने उखाड़ फेंका। पूर्व में जब 'हाथी' (बसपा), 'साइकिल' (सपा) और 'पंजे' (कांग्रेस) ने हमारी आरक्षण की मांग को नहीं सुना, तो वे आज सत्ता से बाहर हैं। अगर भाजपा ने भी समय रहते हमारी जायज मांगें नहीं सुनीं, तो उसका भी यही हश्र होगा और वह भी सत्ता से बाहर हो जाएगी।" इस बयान के जरिए उन्होंने साफ किया कि निषाद समाज की आरक्षण संबंधी मांग को लेकर पार्टी सरकार से ठोस कार्रवाई की अपेक्षा कर रही है।
कार्यक्रम में संजय निषाद ने अपने राजनीतिक और सरकारी पद की भूमिका को लेकर भी स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि वे सरकार में मंत्री बाद में हैं, जबकि अपने समाज के लिए पहले आवाज उठाने वाले व्यक्ति हैं। उन्होंने कहा, "अगर सरकार को मेरी बातें बुरी लगती हैं, तो वह चाहे तो आज ही मेरा मंत्री पद वापस ले ले। मुझे कुर्सी का कोई लालच नहीं है। लेकिन जब तक निषाद समाज की उपजातियों को उनका हक नहीं मिल जाता, मैं चुप नहीं बैठूँगा।" संजय निषाद ने यह भी कहा कि यदि आरक्षण से जुड़ी फाइल को आगे नहीं बढ़ाया गया तो वे अपने समाज के अधिकारों के लिए सड़क पर उतरेंगे। उन्होंने धरने और बड़े आंदोलन से पीछे नहीं हटने की बात कही।
निषाद पार्टी लंबे समय से मछुआरा समुदाय से जुड़ी विभिन्न उपजातियों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिए जाने की मांग करती रही है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक पार्टी की मांग में मल्लाह, केवट, बिंद, कश्यप, धीवर, रायकवार सहित अन्य संबंधित उपजातियों को एससी श्रेणी में शामिल करने का मुद्दा प्रमुख है। पार्टी चाहती है कि इन समुदायों को अनुसूचित जाति श्रेणी के तहत सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का लाभ मिले। निषाद पार्टी का तर्क है कि पूर्व में भी इस मांग को लेकर राजनीतिक स्तर पर आश्वासन दिए गए, लेकिन प्रक्रिया को अंतिम रूप नहीं दिया गया। अब पार्टी केंद्र और राज्य सरकार से इस विषय में आगे की कार्रवाई की मांग कर रही है।
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निषाद समाज मुख्य रूप से नदी, तालाब और जल संसाधनों से जुड़े पारंपरिक व्यवसायों से जुड़ी विभिन्न जातियों और उपजातियों को लेकर राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। यही वजह है कि आरक्षण का सवाल केवल सामाजिक अधिकार के मुद्दे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका राजनीतिक असर भी दिखाई देता है। संजय निषाद के ताजा बयान में आरक्षण की मांग को मुख्य राजनीतिक मुद्दे के रूप में सामने रखा गया है। उनके संबोधन से यह संकेत मिलता है कि निषाद पार्टी इस मुद्दे को लेकर सरकार से स्पष्ट कार्रवाई चाहती है।
संजय निषाद का यह बयान ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों का राजनीतिक दौर शुरू हो चुका है। राज्य में विभिन्न दल अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को मजबूत करने की दिशा में सक्रिय हैं। निषाद पार्टी सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा है और ऐसे में पार्टी अध्यक्ष का यह बयान गठबंधन के भीतर आरक्षण जैसे मुद्दे की अहमियत को सामने लाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार पूर्वांचल और मध्य उत्तर प्रदेश में निषाद और मछुआरा समुदाय से जुड़े मतदाताओं की मौजूदगी कई विधानसभा क्षेत्रों में महत्वपूर्ण है। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और निषाद पार्टी के गठबंधन को इस सामाजिक आधार का लाभ मिलने का उल्लेख भी इसी राजनीतिक संदर्भ में किया गया है। हालांकि, मौजूदा बयान में संजय निषाद ने मुख्य रूप से निषाद समाज की आरक्षण संबंधी मांग को केंद्र में रखा और इसे लेकर सरकार पर कार्रवाई का दबाव बनाने की बात कही।
संजय निषाद ने अपने भाषण में बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का उदाहरण दिया। उन्होंने इन दलों के चुनाव चिह्नों के जरिए कहा कि निषाद समाज की आरक्षण संबंधी मांगों की अनदेखी करने वाले दल सत्ता से बाहर हुए। उन्होंने इसी संदर्भ में भाजपा को भी समय रहते मांगों पर ध्यान देने की चेतावनी दी। उनका बयान सीधे तौर पर आरक्षण के मुद्दे को भाजपा के राजनीतिक प्रदर्शन से जोड़ता है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब सहयोगी दलों की मांगों और सामाजिक समीकरणों को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में लगातार चर्चा होती रहती है।
संजय निषाद का यह कहना कि सरकार चाहे तो उनका मंत्री पद वापस ले सकती है, उनके बयान का एक प्रमुख हिस्सा रहा। उन्होंने इसे निषाद समाज की मांग से जोड़ते हुए कहा कि वे पद की तुलना में समाज के अधिकारों को प्राथमिकता देते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक निषाद समाज की उपजातियों को उनका हक नहीं मिलता, तब तक वे चुप नहीं बैठेंगे। हालांकि उपलब्ध जानकारी में सरकार या भाजपा नेतृत्व की ओर से संजय निषाद के इस बयान पर कोई प्रतिक्रिया शामिल नहीं है। इसलिए सरकार की आगे की कार्रवाई या राजनीतिक प्रतिक्रिया के संबंध में कोई निष्कर्ष निकालना उपलब्ध तथ्यों से संभव नहीं है।
संजय निषाद ने आरक्षण की मांग पर आगे आंदोलन की बात कही। उन्होंने कहा कि यदि संबंधित फाइल को जल्द आगे नहीं बढ़ाया गया तो वे सड़क पर उतरकर धरना और बड़े आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे। इस बयान से स्पष्ट है कि निषाद पार्टी आरक्षण के मुद्दे को लेकर सरकार पर दबाव बनाए रखने की रणनीति पर कायम है। पार्टी की मुख्य मांग मछुआरा समुदाय से जुड़ी उपजातियों को अनुसूचित जाति का दर्जा और आरक्षण का लाभ दिलाने की है।