अब नाबालिग की संपत्ति पर नहीं चलेगा माता-पिता का मनमाना हक़

24 Oct 2025


>सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि अब नाबालिग की संपत्ति पर माता-पिता या अभिभावक मनमाने तरीके से निर्णय नहीं ले सकते। यदि किसी नाबालिग की संपत्ति उसकी सहमति या अदालत की अनुमति के बिना बेच दी जाती है, तो बालिग होने के बाद वह बिना कोई मुकदमा दायर किए, केवल अपने आचरण से ही उस सौदे को अस्वीकार कर सकता है।


>यह अहम फैसला न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने “के. एस. शिवप्पा बनाम श्रीमती के. नीलाम्मा” मामले में सुनाया। न्यायमूर्ति मिथल ने कहा कि “नाबालिग के अभिभावक द्वारा किया गया संपत्ति लेन-देन अमान्य करने योग्य होता है और वयस्क होने पर नाबालिग उसे अदालत में मुकदमा दायर कर या अपने निर्विवाद आचरण से निरस्त कर सकता है।”


>7 अक्टूबर को सुनाए गए इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा “जब कोई नाबालिग वयस्क हो जाता है, तो वह अपने अभिभावक द्वारा की गई संपत्ति के हस्तांतरण को अपने स्पष्ट और निर्विवाद व्यवहार से अस्वीकार कर सकता है, जैसे कि स्वयं उस संपत्ति को बेच देना या किसी और को स्थानांतरित कर देना।”


>इस निर्णय ने यह भी साफ किया कि ऐसी अस्वीकृति के लिए अदालत का सहारा लेना अनिवार्य नहीं है। नाबालिग की स्वतंत्र इच्छा और आचरण ही उसके अधिकारों की रक्षा करने के लिए पर्याप्त माने जाएंगे।


>पीठ ने अपने निर्णय में “हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956” की धारा 7 और 8 का उल्लेख करते हुए कहा “किसी भी स्वाभाविक अभिभावक को अदालत की पूर्व अनुमति के बिना नाबालिग की अचल संपत्ति को गिरवी रखने, बेचने या उपहार में देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।”


>इस प्रावधान के तहत अभिभावक का यह अधिकार सीमित है और यदि उसने अनुमति के बिना लेन-देन किया है, तो वह नाबालिग की वयस्कता प्राप्ति पर चुनौती के लिए खुला रहेगा।


>मामला क्या था?


>यह विवाद कर्नाटक के दावणगेरे जिले के शामनूर गांव की जमीनों से जुड़ा था। रुद्रप्पा नामक व्यक्ति ने 1971 में अपने तीन नाबालिग बेटों महारुद्रप्पा, बसवराज और मुंगेशप्पा के नाम से जमीन खरीदी। बाद में उसने अदालत की अनुमति लिए बिना यह जमीन किसी तीसरे व्यक्ति को बेच दी।


>वर्षों बाद, जब बेटे बालिग हुए, उन्होंने खुद वही जमीन बेच दी — जिससे यह साफ हुआ कि उन्होंने अपने पिता द्वारा किए गए सौदे को अस्वीकार कर दिया। निचली अदालत ने इस आचरण को वैध माना, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे पलट दिया। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत का फैसला बहाल करते हुए नाबालिगों के अधिकार को सर्वोपरि माना।