उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। रालोद और भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन की स्थिति, सीटों के संभावित बंटवारे, जाट और गुर्जर मतदाताओं के रुख तथा युवा और छात्र आंदोलनों के प्रभाव को लेकर राजनीतिक दलों और नेताओं के बीच अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं।
रालोद संसदीय दल के अध्यक्ष केसी त्यागी ने कहा है कि पार्टी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने संगठन को मजबूत करने और बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने में जुटी है। उनके अनुसार बृज प्रदेश, हस्तिनापुर प्रदेश और रूहेलखंड की करीब 85 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां रालोद एनडीए को जीत दिलाने के साथ स्वयं भी बेहतर प्रदर्शन करने की स्थिति में है।
वहीं, समाजवादी पार्टी के नेताओं ने पश्चिमी यूपी में जाट मतदाताओं के रुख को महत्वपूर्ण बताया है। राजनीतिक चर्चा में गुर्जर मतदाताओं की भूमिका और युवा-छात्रों से जुड़े मुद्दों को भी चुनावी समीकरण का हिस्सा माना जा रहा है।
केसी त्यागी के मुताबिक रालोद का संगठन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि पार्टी का नारा 'मजबूत आरएलडी-मजबूत एनडीए' है। त्यागी ने कहा कि बृज प्रदेश, हस्तिनापुर प्रदेश और रूहेलखंड की करीब 85 विधानसभा सीटों पर रालोद एनडीए के लिए उपयोगी साबित हो सकती है और पार्टी खुद भी बेहतर प्रदर्शन की स्थिति में है।
यह खबर भी पढ़े - रात 2:30 बजे पीतमपुरा में कपड़ों की दुकान में लगी आग, 13 दमकल गाड़ियां पहुंचीं
भाजपा और रालोद के बीच विधानसभा चुनाव के लिए सीटों के बंटवारे को लेकर अभी औपचारिक सीधी वार्ता शुरू नहीं हुई है। हालांकि, केसी त्यागी ने कहा कि सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच विवाद नहीं होगा। यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों दल आगामी विधानसभा चुनाव के लिए संगठनात्मक तैयारियों पर जोर दे रहे हैं।
रालोद ने पिछला उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में लड़ा था। पार्टी ने 33 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। इनमें से आठ उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल रहे थे, जबकि 15 प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे थे।
इसके बाद खतौली विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में जीत दर्ज करने के साथ विधानसभा में रालोद की संख्या बढ़कर नौ हो गई थी। इस प्रदर्शन के आधार पर रालोद ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने संगठन और राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखने की कोशिश जारी रखी है।
यह खबर भी पढ़े - नरेला में मर्सिडीज ने पहले कार-टेंपो को मारी टक्कर, फिर बुजुर्ग महिला की मौत
2024 का लोकसभा चुनाव रालोद ने भाजपा के साथ गठबंधन में लड़ा था। इस चुनाव में रालोद के दो उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। बिजनौर लोकसभा सीट से रालोद के युवा प्रत्याशी चंदन चौहान और बागपत से डॉ. राजकुमार सांगवान निर्वाचित हुए।
विधानसभा चुनाव को लेकर रालोद की मौजूदा रणनीति को इसी गठबंधन की निरंतरता के संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि, विधानसभा सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच औपचारिक बातचीत शुरू होने की जानकारी सामने नहीं आई है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाट मतदाताओं की भूमिका को लेकर सपा नेताओं ने अलग रुख व्यक्त किया है। सपा के राष्ट्रीय महासचिव और विधान परिषद सदस्य राजेंद्र चौधरी ने कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट मतदाताओं का रुख चुनावी परिणामों को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण कारक रहेगा।
उन्होंने दावा किया कि भाजपा-रालोद गठबंधन को करीब 20 से 22 प्रतिशत जाट मतदाताओं का समर्थन मिल सकता है। राजेंद्र चौधरी ने सपा और रालोद के पुराने राजनीतिक संबंधों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सपा ने लोकसभा चुनाव में रालोद को सात सीटें दी थीं, जबकि भाजपा के साथ गठबंधन में रालोद को दो सीटें मिलीं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें रालोद के दोबारा सपा के साथ गठबंधन में लौटने की संभावना कम लगती है।
मुजफ्फरनगर से सपा सांसद और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रमुख जाट नेताओं में शामिल हरेंद्र मलिक ने भी रालोद के सपा के साथ वापस आने की संभावना कम बताई। हालांकि, उन्होंने कहा कि यदि जयंत चौधरी सपा के साथ आना चाहेंगे तो वह सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से इसकी सिफारिश कर सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतिम निर्णय पार्टी अध्यक्ष ही करेंगे। हरेंद्र मलिक का दावा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट मतदाताओं का रुझान सपा की ओर है और भाजपा के साथ जाटों के संबंध सहज नहीं रहे हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि जयंत चौधरी फिलहाल जिस गठबंधन में हैं, उसी में बने रहेंगे।
पश्चिमी यूपी के चुनावी समीकरणों में केवल जातीय राजनीति ही नहीं, बल्कि युवा और छात्र मुद्दों को लेकर भी चर्चा हो रही है। पूर्व उपमुख्यमंत्री चौधरी नारायण सिंह और चौधरी चरण सिंह के साथ काम कर चुके राजनीतिक चिंतक एवं बुद्धिजीवी चौधरी प्रीतम सिंह ने दावा किया कि भाजपा की लोकप्रियता में गिरावट आई है। उन्होंने कहा कि सरकार मजबूती के साथ चल रही हो सकती है, लेकिन लोग भय और दबाव वाली सरकार पसंद नहीं करते।
प्रीतम सिंह ने नीट परीक्षा में कथित पेपर लीक, बेरोजगारी और अन्य मुद्दों को लेकर हुए छात्र एवं युवा आंदोलनों का उल्लेख किया। उनके अनुसार इन मुद्दों का प्रभाव चुनाव में दिखाई दे सकता है। उन्होंने बिहार के बांकीपुर और मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनावों का उदाहरण देते हुए कहा कि इन मुद्दों का प्रभाव वहां दिखाई दिया।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट मतदाताओं के साथ गुर्जर समुदाय के वोट को भी चुनावी समीकरण के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। चौधरी प्रीतम सिंह ने कहा कि गुर्जर मतदाताओं का रुख भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। रालोद के बिजनौर सांसद चंदन चौहान गुर्जर समुदाय से आते हैं। उनके पिता संजय चौहान और दादा तथा पूर्व उपमुख्यमंत्री चौधरी नारायण सिंह का भी गुर्जर समाज में प्रभाव रहा है।
रालोद के लिए यह सामाजिक समीकरण महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी से जुड़े नेताओं का मानना है कि इसका लाभ गुर्जर मतदाताओं के बीच संगठन को मिल सकता है। हालांकि, चुनाव में किसी समुदाय का अंतिम मतदान रुख अभी तय नहीं है और अलग-अलग राजनीतिक नेताओं की ओर से इस संबंध में अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं।
चौधरी प्रीतम सिंह ने कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों की गहरी समझ रखने वाले केसी त्यागी के सक्रिय होने से जयंत चौधरी को लाभ मिल सकता है। उनका कहना है कि यदि रालोद चुनाव में स्थानीय और जिताऊ समीकरणों को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवारों का चयन करती है तो उसे फायदा हो सकता है। उन्होंने जाट मतदाताओं को लेकर दावा किया कि 20 से 25 प्रतिशत से अधिक जाट मतदाता भाजपा-रालोद गठबंधन के पक्ष में नहीं जाएंगे। यह आंकड़ा उनका राजनीतिक आकलन है और इसे चुनावी परिणाम या किसी स्वतंत्र सर्वेक्षण के निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जा सकता।
रालोद नेताओं का मानना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की किसान समर्थक नीतियों और जयंत चौधरी के नेतृत्व में पार्टी की संगठनात्मक सक्रियता का लाभ आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा-रालोद गठबंधन को मिल सकता है।
पार्टी के अनुसार जयंत चौधरी के निर्देशन में कार्यकर्ता और संगठन चुनाव की तैयारियों में जुटे हैं। बूथ स्तर पर संगठन को सक्रिय करना और जिलों में पार्टी की स्थिति मजबूत करना रालोद की प्राथमिकताओं में शामिल बताया गया है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में रालोद और सपा पहले भी गठबंधन के साथ चुनाव लड़ चुके हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में दोनों दल साथ थे, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में रालोद ने भाजपा के साथ गठबंधन किया। इस राजनीतिक बदलाव के कारण आगामी विधानसभा चुनाव में रालोद की गठबंधन रणनीति पर विशेष नजर है।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार भाजपा और रालोद के बीच विधानसभा चुनाव के लिए सीटों के बंटवारे पर औपचारिक सीधी बातचीत शुरू नहीं हुई है। ऐसे में सीटों का अंतिम बंटवारा और दोनों दलों की चुनावी रणनीति बाद की राजनीतिक प्रक्रिया में स्पष्ट होगी।
आगामी विधानसभा चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों में कई मुद्दे महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इनमें जाट और गुर्जर मतदाताओं का रुख, किसान मतदाताओं की प्राथमिकताएं, युवा और छात्र मुद्दे, बेरोजगारी से जुड़े सवाल तथा भाजपा-रालोद गठबंधन की सीट बंटवारे की रणनीति शामिल हैं।
रालोद के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश उसका प्रमुख राजनीतिक आधार क्षेत्र रहा है। पार्टी की कोशिश संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने और गठबंधन में अपनी भूमिका मजबूत रखने की है। दूसरी ओर, सपा नेता जाट मतदाताओं के समर्थन को अपने पक्ष में बताते हुए भाजपा-रालोद गठबंधन के प्रभाव को लेकर अलग आकलन पेश कर रहे हैं।
इस बीच गुर्जर मतदाताओं को लेकर भी दोनों पक्षों की रणनीति महत्वपूर्ण होगी। चंदन चौहान की बिजनौर से जीत और उनके परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि को रालोद के सामाजिक समीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है। आगामी विधानसभा चुनाव में इन दावों और राजनीतिक रणनीतियों का वास्तविक असर चुनावी मैदान में उम्मीदवारों के चयन, गठबंधन की सीट व्यवस्था और मतदाताओं के अंतिम रुख के साथ स्पष्ट होगा।