>उत्तर प्रदेश में सहकारिता विभाग की लापरवाही एक बार फिर सुर्खियों में है। बहुद्देशीय प्रारंभिक कृषि सहकारी समितियों (बी-पैक्स) के कंप्यूटरीकरण के लिए केंद्र सरकार से प्राप्त करीब 20 करोड़ रुपये की धनराशि को अधिकारियों की निष्क्रियता के चलते वापस लौटाना पड़ा है। इससे न केवल परियोजना की गति पर असर पड़ा है, बल्कि राज्य के हजारों किसानों और ग्रामीणों की डिजिटल सेवाओं तक पहुंच की उम्मीदों को भी बड़ा झटका लगा है।
>प्रदेश में कुल 7414 सक्रिय बी-पैक्स समितियां हैं, जिनमें से अब तक 3000 समितियों का कंप्यूटरीकरण हो चुका है। शेष 4414 बी-पैक्स यूनिट्स के कंप्यूटरीकरण के लिए वित्तीय वर्ष 2024-25 में केंद्र सरकार ने 20 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की थी। सरकार की शर्तों के अनुसार, इस कार्य को 30 जून 2025 तक पूर्ण करना अनिवार्य था।
>लेकिन तय समय सीमा बीत जाने के बाद भी कोई ठोस कार्यवाही न होने के कारण पूरी राशि केंद्र को लौटानी पड़ी। यह गंभीर लापरवाही बताती है कि प्रशासनिक स्तर पर योजनाओं की न निगरानी हो रही है और न ही ज़िम्मेदारी तय की जा रही है।
>गौरतलब है कि बी-पैक्स समितियों का कंप्यूटरीकरण केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को डिजिटल बनाकर किसानों को खाद-बीज, बैंकिंग, जन सुविधा केंद्र, और कृषि सेवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है।
>इस मामले को गंभीरता से लेते हुए सहकारिता राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जेपीएस राठौर ने केंद्र सरकार से फिर से राशि जारी करने का आग्रह किया है। उनका दावा है कि मंत्रालय ने जल्द ही धनराशि फिर से जारी करने का आश्वासन दिया है। साथ ही, उन्होंने अधिकारियों को निर्देशित किया है कि बजट प्राप्त होते ही तत्काल टेंडर प्रक्रिया शुरू कर कंप्यूटरीकरण कार्य में तेजी लाई जाए।
>यह स्पष्ट है कि अगर इस योजना को समयबद्ध और पारदर्शी तरीके से लागू नहीं किया गया, तो किसानों के लिए डिजिटलीकरण के माध्यम से मिलने वाले लाभ एक बार फिर कागजों में ही सिमटकर रह जाएंगे।
>अब ज़रूरत है प्रशासनिक जवाबदेही तय करने और इस तरह की योजनाओं को राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ धरातल पर उतारने की, ताकि "डिजिटल भारत" का सपना गांवों तक सही मायनों में पहुंच सके।