गांवों की महिलाओं ने बदली यूपी की तस्वीर, 1 करोड़ महिलाएं बनीं आर्थिक बदलाव की ताकत; 10 लाख समूहों ने रचा नया मॉडल

12 Jul 2026

उत्तर प्रदेश में ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक भागीदारी लगातार बढ़ रही है। राज्य में करीब 1 करोड़ महिलाएं 10 लाख स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) से जुड़कर स्वरोजगार, उद्यमिता और सामूहिक व्यवसाय के माध्यम से आय बढ़ाने का काम कर रही हैं। उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत संचालित इन समूहों के जरिए महिलाएं अब केवल बचत और ऋण गतिविधियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कृषि प्रसंस्करण, डेयरी, हस्तशिल्प, सिलाई, खाद्य उत्पाद निर्माण और ग्रामीण बाजारों में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को बैंक लिंकेज, कौशल विकास प्रशिक्षण और स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग एवं विपणन से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप कई समूह छोटे घरेलू कारोबार से आगे बढ़कर संगठित उद्यम के रूप में विकसित हुए हैं।

ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत गठित स्वयं सहायता समूहों का उद्देश्य महिलाओं को वित्तीय रूप से सशक्त बनाना है। अब इन समूहों के माध्यम से महिलाएं नए व्यवसाय शुरू कर रही हैं, बैंकिंग सुविधाओं का उपयोग कर रही हैं और विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लेकर अपने उत्पादों की गुणवत्ता और बाजार तक पहुंच बढ़ा रही हैं।

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सरकारी स्तर पर महिलाओं को आधुनिक पैकेजिंग, ब्रांडिंग और विपणन से जोड़ने पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है, ताकि स्थानीय स्तर पर तैयार उत्पाद व्यापक बाजार तक पहुंच सकें।

वाराणसी की रहने वाली रीना सिंह की कहानी स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से विकसित हो रही महिला उद्यमिता का एक उदाहरण है। पारिवारिक संकट के बाद उन्होंने 11 महिलाओं के साथ मिलकर महादेव स्वयं सहायता समूह की शुरुआत की।

शुरुआत में समूह ने पिसे हुए मसालों का छोटा कारोबार शुरू किया, जो समय के साथ हल्दी, धनिया और दालों के प्रसंस्करण तक पहुंच गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह उद्यम अब 80 लाख रुपये से अधिक के वार्षिक कारोबार तक पहुंच चुका है और इससे 200 से अधिक ग्रामीण महिलाओं को प्रत्यक्ष रोजगार मिल रहा है।

प्रदेश के विभिन्न जिलों से मिल रही जानकारी के अनुसार, स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं अब केवल कृषि आधारित गतिविधियों तक सीमित नहीं हैं। वे डेयरी, सिलाई, हस्तशिल्प, रेडी-टू-ईट खाद्य उत्पाद निर्माण, ग्रामीण मार्ट संचालन और अन्य लघु उद्योगों में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

इन समूहों द्वारा तैयार उत्पादों की पैकेजिंग, ब्रांडिंग और मूल्य संवर्धन पर भी काम किया जा रहा है, जिससे स्थानीय उत्पादों की बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने का प्रयास हो रहा है।

ग्रामीण क्षेत्रों में स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से बढ़ती आर्थिक गतिविधियों से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं। सरकारी दावे के अनुसार, गांवों में आय के नए स्रोत विकसित होने से रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन में कमी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है और छोटे उद्यमों के विस्तार की संभावनाएं भी बढ़ती हैं।

राज्य सरकार स्वयं सहायता समूहों को डिजिटल तकनीक, आधुनिक मशीनरी, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और बड़े विपणन नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में भी काम कर रही है। इसका उद्देश्य महिला उद्यमियों के उत्पादों को व्यापक बाजार उपलब्ध कराना और ग्रामीण उद्यमों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाना है। इसके साथ ही महिलाओं को आधुनिक व्यावसायिक प्रशिक्षण, वित्तीय प्रबंधन और विपणन संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने पर भी फोकस किया जा रहा है।