बाराबंकी। सरकारी विद्यालयों में समयबद्ध शिक्षण और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को लेकर किए जा रहे दावों के बीच बाराबंकी जिले के सिद्धौर ब्लॉक से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने स्थानीय स्तर पर सरकारी स्कूलों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। गुरुवार सुबह ग्राम पंचायत पड़रावां स्थित प्राथमिक विद्यालय में हुए औचक निरीक्षण के दौरान बच्चे तो अपनी कक्षाओं में मौजूद मिले, लेकिन उन्हें पढ़ाने वाले प्रधानाध्यापक विद्यालय नहीं पहुंचे थे।
ग्राम सभा के प्रशासक जब ग्रामीणों के साथ सुबह करीब 8:40 बजे विद्यालय पहुंचे तो वहां केवल शिक्षामित्र मनारा देवी मौजूद मिलीं। प्रधानाध्यापक अनिल कुमार विद्यालय में नहीं थे। निरीक्षण के दौरान बच्चों से बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि प्रधानाध्यापक के आने का कोई निश्चित समय नहीं है और कई बार उन्हें इंतजार करना पड़ता है।
निरीक्षण के दौरान जब बच्चों ने बताया कि प्रधानाध्यापक अक्सर देर से आते हैं, तो मौके पर मौजूद ग्रामीणों ने भी इस पर चिंता जताई। उनका कहना था कि विद्यालय में पढ़ाई का समय निर्धारित है और बच्चों को समय से विद्यालय पहुंचने के लिए प्रेरित किया जाता है। ऐसे में यदि शिक्षक स्वयं समय का पालन नहीं करेंगे तो बच्चों में अनुशासन और नियमितता की भावना विकसित करना कठिन होगा। ग्रामीणों का आरोप है कि शिक्षण कार्य समय पर शुरू न होने से विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होती है, जिसका असर सीधे उनकी सीखने की प्रक्रिया पर पड़ता है।
औचक निरीक्षण के दौरान विद्यालय में शिक्षामित्र मनारा देवी मौजूद थीं और बच्चों की देखरेख कर रही थीं। हालांकि प्रधानाध्यापक की अनुपस्थिति के कारण विद्यालय का नियमित संचालन प्रभावित दिखाई दिया। निरीक्षण के समय बच्चों की उपस्थिति और प्रधानाध्यापक की गैरमौजूदगी पूरे घटनाक्रम का प्रमुख बिंदु रही।
निरीक्षण के बाद ग्राम सभा के प्रशासक ने पूरे मामले की जानकारी तत्काल खंड शिक्षा अधिकारी (एबीएसए) को दी। अधिकारियों के अनुसार मामले की जांच कराई जाएगी और यदि जांच में लापरवाही की पुष्टि होती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
निरीक्षण के दौरान मौजूद रामतीरथ, रामदीन, रामकुमार समेत अन्य ग्रामीणों ने कहा कि सरकारी विद्यालयों में शिक्षा सुधार से जुड़ी योजनाओं का लाभ तभी मिलेगा, जब विद्यालयों में समय से शिक्षण कार्य शुरू हो और शिक्षक अपनी जिम्मेदारियों का नियमित रूप से निर्वहन करें।
ग्रामीणों ने यह भी सवाल उठाया कि यदि छात्र-छात्राओं के लिए समय पर विद्यालय पहुंचना अनिवार्य है, तो शिक्षकों की समयबद्ध उपस्थिति सुनिश्चित करने की जवाबदेही किसकी है। उनका कहना है कि सरकारी विद्यालयों में होने वाली ऐसी लापरवाही का सबसे अधिक असर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों पर पड़ता है, जिनकी शिक्षा पूरी तरह सरकारी स्कूलों पर निर्भर है।
फिलहाल शिक्षा विभाग ने मामले की जांच का आश्वासन दिया है। जांच में यदि ग्रामीणों के आरोप सही पाए जाते हैं तो कार्रवाई केवल संबंधित प्रधानाध्यापक तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि विद्यालयों की निगरानी व्यवस्था और समयबद्ध उपस्थिति सुनिश्चित करने की प्रक्रिया भी समीक्षा के दायरे में आ सकती है।
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