लखनऊ, 26 सितंबर 2026: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में कांग्रेस नेताओं आराधना मिश्रा ‘मोना’ और राष्ट्रीय प्रवक्ता अभय दुबे ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया, आयोग के भीतर सामने आई कथित आपत्तियों और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर सवाल उठाए। संयुक्त प्रेस वार्ता में कांग्रेस नेताओं ने मतदाता सूची से जुड़े बदलावों, नए मतदाताओं के पंजीकरण और एसआईआर की प्रक्रिया के कानूनी आधार पर चर्चा की।
प्रेस वार्ता में कांग्रेस ने विशेष रूप से चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की वर्तमान व्यवस्था, 2023 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले और इसके बाद संसद द्वारा बनाए गए कानून के बीच अंतर, आयोग में दो चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई आपत्तियों तथा फॉर्म-6 में किए गए बदलाव का मुद्दा उठाया।
हालांकि, चुनाव आयोग ने हाल में सामने आई आंतरिक मतभेदों की रिपोर्ट पर कहा है कि व्यक्तिगत टिप्पणियां या आपत्तियां संस्थागत निर्णय नहीं होतीं और एसआईआर समेत आयोग के सभी अंतिम निर्णय तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
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मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 2 मार्च 2023 को अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में फैसला सुनाया था। पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा था कि जब तक संसद इस विषय पर कानून नहीं बनाती, तब तक नियुक्तियां प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति की सिफारिश पर की जाएंगी।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश उस समय लागू रहने वाली व्यवस्था के संदर्भ में था और फैसले में स्पष्ट किया गया था कि यह व्यवस्था संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक जारी रहेगी।
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इसके बाद संसद ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और पदावधि से संबंधित कानून बनाया। 2023 के कानून में नियुक्ति के लिए चयन समिति की संरचना निर्धारित की गई और भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को समिति में रखा गया। इस कानून के लागू होने के बाद नियुक्ति प्रक्रिया वैधानिक प्रावधानों के तहत संचालित हुई।
फरवरी 2025 में ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किए जाने के समय लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने चयन समिति की बैठक में असहमति नोट दर्ज किया था।
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, गांधी ने चयन समिति की संरचना में भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल नहीं किए जाने और उस समय सुप्रीम कोर्ट में लंबित चुनौती का हवाला देते हुए नियुक्ति प्रक्रिया पर आपत्ति जताई थी। उनका असहमति नोट सार्वजनिक भी हुआ था।
यह मुद्दा लखनऊ की प्रेस वार्ता में कांग्रेस द्वारा उठाए गए सवालों का भी हिस्सा रहा। कांग्रेस का तर्क था कि चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान में नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता और संस्थागत स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है।
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लखनऊ की प्रेस वार्ता में कांग्रेस ने हाल में सामने आई उन रिपोर्टों का भी उल्लेख किया, जिनमें चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा पिछले करीब 10 महीनों में विभिन्न फैसलों और प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां या टिप्पणियां दर्ज किए जाने की बात कही गई है।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, ये आपत्तियां मतदाता सूची में नाम जोड़ने, नाम हटाने और बहाल करने, फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता डेटा के प्रबंधन तथा एसआईआर से जुड़े विषयों पर थीं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कुछ आपत्तियों में दोनों आयुक्तों ने फैसलों या प्रक्रियाओं के बारे में उन्हें पर्याप्त जानकारी नहीं दिए जाने से जुड़े सवाल उठाए थे।
रिपोर्ट के अनुसार, कुछ आपत्तियां मतदाता सूची से संबंधित सूचना-प्रौद्योगिकी प्रणालियों के नियंत्रण और डेटाबेस के केंद्रीकरण से भी जुड़ी थीं।
इन रिपोर्टों के बाद निर्वाचन आयोग की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि आयोग के भीतर अलग-अलग मुद्दों पर टिप्पणियां या तकनीकी सुझाव होना सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग के सूत्रों ने कहा कि व्यक्तिगत राय को अंतिम संस्थागत निर्णय नहीं माना जा सकता।
निर्वाचन आयोग के अनुसार, एसआईआर सहित उसके सभी निर्णय तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग ने आंतरिक विचार-विमर्श और अंतिम निर्णय के बीच अंतर को भी रेखांकित किया।
इस तरह उपलब्ध रिपोर्टों में दो अलग-अलग पहलू सामने आते हैं—एक ओर दो चुनाव आयुक्तों की ओर से विभिन्न विषयों पर दर्ज आपत्तियों की रिपोर्ट है और दूसरी ओर निर्वाचन आयोग का आधिकारिक पक्ष है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मत थे।
नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए फॉर्म-6 का इस्तेमाल किया जाता है। एसआईआर से संबंधित प्रक्रिया के दौरान इस फॉर्म में ऐसा सवाल जोड़े जाने की रिपोर्ट सामने आई, जिसमें आवेदक से यह जानकारी मांगी गई कि उसका, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली एसआईआर की मतदाता सूची में था या नहीं।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई 2026 में इस बदलाव की वैधानिक प्रक्रिया पर सवाल उठाया था। रिपोर्ट के अनुसार, उनका कहना था कि संबंधित नियमों में बदलाव के बिना फॉर्म में इस तरह का परिवर्तन नहीं किया जा सकता। बाद में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी इस बदलाव पर आपत्ति जताई।
रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2026 में बदलाव लागू होने के बाद संधू ने इसे हटाने की मांग की और इसे “अनधिकृत और अवैध” बताया। यह शब्द चुनाव आयुक्त की दर्ज आपत्ति के संदर्भ में रिपोर्ट किए गए हैं और इसे निर्वाचन आयोग का अंतिम कानूनी निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।
कांग्रेस नेताओं ने प्रेस वार्ता में एसआईआर की प्रक्रिया, मतदाता सूची से नाम हटाने, नए मतदाताओं के पंजीकरण और अतिरिक्त दस्तावेज मांगे जाने से संबंधित सवाल उठाए।
कांग्रेस की ओर से प्रस्तुत आंकड़ों में पहले दो चरणों में बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने और तीसरे चरण में अतिरिक्त दस्तावेजों के लिए नोटिस दिए जाने का उल्लेख किया गया। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सितंबर 2026 में कहा था कि पहले दो चरणों में 7.8 करोड़ नाम हटाए गए और तीसरे चरण में 6.18 करोड़ नाम हटाए जाने की बात कही गई। उन्होंने यह भी कहा कि 5.43 करोड़ मतदाताओं को अतिरिक्त दस्तावेज उपलब्ध कराने के लिए नोटिस दिए गए हैं।
इन आंकड़ों को रिपोर्ट करते समय यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ये कांग्रेस की ओर से प्रस्तुत आंकड़े हैं। इन्हें निर्वाचन आयोग के अंतिम समेकित आंकड़ों के रूप में नहीं प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर एसआईआर के तीसरे चरण के तहत 19 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से संबंधित प्रक्रिया की जानकारी उपलब्ध है। आयोग ने 31 मई 2026 को ओडिशा, मिजोरम, सिक्किम और मणिपुर में तीसरे चरण की गणना प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी भी प्रकाशित की थी।
मतदाता सूची की तैयारी और पुनरीक्षण से संबंधित प्रावधान जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 में मौजूद हैं। धारा 21 मतदाता सूचियों की तैयारी और पुनरीक्षण से संबंधित है।
कांग्रेस ने प्रेस वार्ता में इसी प्रावधान का हवाला देते हुए यह सवाल उठाया कि निर्वाचन आयोग को प्राप्त संवैधानिक और वैधानिक शक्तियों के तहत नई प्रक्रियाएं या अनिवार्य शर्तें किस सीमा तक निर्धारित की जा सकती हैं।
इस चर्चा में संविधान का अनुच्छेद 324 और अनुच्छेद 327 भी महत्वपूर्ण हैं। अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण से संबंधित संवैधानिक अधिकार देता है, जबकि चुनावों और मतदाता सूचियों से जुड़े कानून बनाने की शक्ति संसद के पास है।
इस क्षेत्र में सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग मामलों में निर्वाचन आयोग की संवैधानिक शक्तियों की सीमा पर विचार किया है। मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त मामले में अनुच्छेद 324 की शक्तियों पर विचार हुआ था। वहीं ए.सी. जोस बनाम सिवन पिल्लै मामले में आयोग की शक्तियों और संसद द्वारा बनाए गए कानून के बीच संबंध पर न्यायालय ने विचार किया था।
इसलिए एसआईआर से जुड़े विवाद में एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न आयोग के पास मतदाता सूची के पुनरीक्षण की शक्ति और उस शक्ति के इस्तेमाल के लिए अपनाई गई विशिष्ट प्रक्रियाओं के बीच अंतर से संबंधित है।
2023 के कानून में निर्वाचन आयोग के कामकाज से संबंधित प्रावधान भी हैं। उपलब्ध कानूनी ढांचे के अनुसार आयोग के कामकाज में जहां तक संभव हो सर्वसम्मति का प्रयास किया जाना है और मतभेद होने की स्थिति में बहुमत की राय के आधार पर निर्णय लिया जा सकता है।
इसका अर्थ है कि तीन सदस्यीय आयोग में दो सदस्यों की सहमति होने पर निर्णय लिया जा सकता है। हालांकि, मौजूदा विवाद में निर्वाचन आयोग ने यह कहा है कि एसआईआर समेत उसके अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
लखनऊ की प्रेस वार्ता में कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयुक्त अशोक लवासा की आपत्तियों का भी संदर्भ दिया।
उस समय लवासा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से जुड़े आदर्श आचार संहिता के मामलों में आयोग के फैसलों के दौरान अपनी अलग राय दर्ज करने की मांग की थी। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने कुछ मामलों में आयोग के निर्णयों से असहमति जताई और बाद में आचार संहिता से संबंधित बैठकों से खुद को अलग किया।
मई 2019 में निर्वाचन आयोग ने लवासा की मांग पर निर्णय लेते हुए कहा था कि अल्पमत की राय आयोग के रिकॉर्ड का हिस्सा रहेगी, लेकिन उसे अंतिम आदेश में शामिल नहीं किया जाएगा। बाद में आरटीआई के तहत लवासा के असहमति नोट मांगे जाने पर आयोग ने उन्हें उपलब्ध नहीं कराया था।
यह संदर्भ इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मौजूदा बहस में भी चुनाव आयोग के भीतर व्यक्तिगत या अल्पमत राय, उनके रिकॉर्ड और अंतिम संस्थागत निर्णय की प्रक्रिया पर चर्चा हो रही है।
लखनऊ की प्रेस वार्ता में कई अलग-अलग मुद्दों को एक साथ उठाया गया। इनमें मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया, आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया, एसआईआर, फॉर्म-6 में बदलाव और मतदाता सूची के प्रबंधन से जुड़े सवाल शामिल हैं।
इन मुद्दों का कानूनी आधार भी अलग-अलग है। मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति का विषय 2023 के संसद द्वारा बनाए गए कानून से जुड़ा है, जबकि एसआईआर मतदाता सूची के पुनरीक्षण से संबंधित है।
इसी तरह फॉर्म-6 में बदलाव का प्रश्न मतदाता पंजीकरण की निर्धारित प्रक्रिया से संबंधित है। इसलिए इन सभी विषयों पर किसी एक दावे के आधार पर व्यापक निष्कर्ष निकालने के बजाय संबंधित कानून, नियम, आयोग के आदेश और न्यायिक फैसलों को अलग-अलग देखना जरूरी है।
प्रेस वार्ता में कांग्रेस नेताओं ने कहा कि मतदाता सूची से संबंधित फैसलों में पारदर्शिता और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन होना चाहिए। पार्टी ने आयोग में दर्ज आपत्तियों, एसआईआर और फॉर्म-6 में बदलाव को इसी व्यापक संदर्भ में उठाया।
कांग्रेस नेताओं ने यह भी कहा कि मतदाता सूची नागरिकों के मतदान अधिकार से सीधे जुड़ी है और इसलिए उसमें नाम जोड़ने, हटाने या सुधार की प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए।
दूसरी ओर निर्वाचन आयोग का कहना है कि एसआईआर समेत उसके निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं और आंतरिक टिप्पणियां संस्थागत निर्णयों से अलग होती हैं।