लखनऊ के केजीएमयू कलाम सेंटर में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन ईक्विकॉन–2026 का समापन समावेशी, संवेदनशील और वैज्ञानिक आधार पर विकसित स्वास्थ्य सेवाओं के सशक्त संदेश के साथ हुआ। सम्मेलन में स्वास्थ्य सेवाओं में समानता, लैंगिक विविधता और प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा को केंद्र में रखते हुए व्यापक चर्चा की गई।
सम्मेलन का मुख्य विषय “स्वास्थ्य सेवाओं में समानता एवं समावेशन” रहा। इसका आयोजन विश्वविद्यालय के मनोरोग विभाग द्वारा इंडियन साइकियाट्रिक सोसायटी और एसोसिएशन ऑफ क्लिनिकल साइकियाट्री के सहयोग से किया गया। कार्यक्रम अंतरराष्ट्रीय समलैंगिकता, उभयलैंगिकता और ट्रांसफोबिया विरोध दिवस 2026 के अवसर पर सुरम्या लाइफ फाउंडेशन तथा साथी के सहयोग से सम्पन्न हुआ।
सम्मेलन का आयोजन विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. डॉ. सोनिया नित्यानंद के संरक्षण और मार्गदर्शन में किया गया। देशभर से आए मनोचिकित्सकों, चिकित्सकों, शोधकर्ताओं, नीति-निर्माताओं और सामुदायिक प्रतिनिधियों ने इसमें सहभागिता की। सम्मेलन से पहले 16 मई को आयोजित प्री-कॉन्फ्रेंस कार्यशाला में एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय से संबंधित स्वास्थ्य सेवाओं, मानसिक स्वास्थ्य और संवेदनशील व्यवहार पर प्रशिक्षण दिया गया।
कार्यशाला में डॉ. एल. रामकृष्णन, फ्रेड रोजर्स, कानमणि रे, डॉ. संजय शर्मा और डॉ. के.पी. रानाडे सहित कई विशेषज्ञों ने सहभागिता की। कार्यशाला में लैंगिक पहचान, मानसिक स्वास्थ्य, यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य, समावेशी चिकित्सा व्यवस्था और चिकित्सकीय-कानूनी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई।
ईक्विकॉन–2026 के आयोजन अध्यक्ष डॉ. पवन कुमार गुप्ता रहे। सम्मेलन में डॉ. शेखर शेषाद्रि, डॉ. वेंकटेशन चक्रपाणि और डॉ. स्वप्नजीत साहू ने अपने व्याख्यानों में लैंगिक विविधता, स्वास्थ्य असमानता, आत्महत्या रोकथाम और एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय के मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषयों पर अपने विचार साझा किए।
सम्मेलन के दौरान जेंडर-अफर्मेटिव हेल्थकेयर, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में समावेशन, सामाजिक भेदभाव, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और संस्थागत संवेदनशीलता जैसे मुद्दों पर गंभीर विमर्श हुआ। विभिन्न राज्यों से आए शोधकर्ताओं और स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तुत शोध-पत्रों में ट्रांसजेंडर हेल्थकेयर, अफर्मेटिव साइकोथेरेपी, सामाजिक कलंक और सामुदायिक हस्तक्षेप जैसे विषयों को प्रमुखता से उठाया गया।
सम्मेलन संचालन समिति ने कहा, “ईक्विकॉन–2026 की सफलता भारत के चिकित्सा विमर्श में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है। संवेदनशीलता और वैज्ञानिक प्रमाणों को साथ लेकर हम केवल उपचार नहीं कर रहे, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं में प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा के अधिकार को पुनर्स्थापित कर रहे हैं।”
आयोजकों के अनुसार सम्मेलन से प्राप्त सुझाव भविष्य में समावेशी स्वास्थ्य नीतियों, चिकित्सा शिक्षा और संस्थागत सुधारों के लिए महत्वपूर्ण आधार साबित हो सकते हैं। समापन सत्र में डॉ. पवन कुमार गुप्ता ने सभी वक्ताओं, प्रतिभागियों, सहयोगी संस्थाओं, स्वयंसेवकों और मीडिया प्रतिनिधियों का आभार व्यक्त किया।
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