लोकसभा में महिला आरक्षण बिल फेल: अब क्या विकल्प, 2029 चुनाव पर क्या असर

विशेष बहुमत नहीं मिलने से अटका रास्ता, अब सरकार के सामने सहमति और पुनर्प्रस्तुति जैसे विकल्प

लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े परिसीमन संशोधन बिल को शुक्रवार शाम आवश्यक विशेष बहुमत नहीं मिल सका, जिसके चलते यह विधेयक गिर गया। इसके साथ ही संसद के विशेष सत्र का मुख्य उद्देश्य अधूरा रह गया और महिला आरक्षण को जल्द लागू करने की योजना को झटका लगा है।

 

शाम 7:45 बजे हुई वोटिंग में बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि इसके विरोध में 230 वोट दर्ज किए गए। संविधान संशोधन विधेयक होने के कारण इसे पारित करने के लिए कुल 326 वोटों की आवश्यकता थी, जो पूरी नहीं हो सकी। विपक्ष ने पहले ही इस बिल का विरोध करते हुए इसे पूरी तरह खारिज कर दिया था।

 

संविधान के प्रावधानों के अनुसार, इस स्थिति में संयुक्त सत्र बुलाकर बिल पास नहीं कराया जा सकता। अनुच्छेद 108 केवल साधारण विधेयकों पर लागू होता है, जबकि संविधान संशोधन के लिए अनुच्छेद 368 के तहत दोनों सदनों में अलग-अलग विशेष बहुमत जरूरी होता है। ऐसे में लोकसभा में विफलता के बाद संयुक्त सत्र का रास्ता बंद हो गया है।

 

2023 में पारित 106वां संविधान संशोधन, जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम से जाना जाता है, पहले ही कानून बन चुका है। लेकिन उसका क्रियान्वयन परिसीमन और जनगणना पर निर्भर है।

 

131वें संशोधन बिल का उद्देश्य 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन कर 2029 के लोकसभा चुनाव से ही 33% महिला आरक्षण लागू करना था। अब इस बिल के गिरने के बाद महिला आरक्षण का लागू होना अगली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन तक टल गया है, जो विशेषज्ञों के अनुसार 2034 या उसके बाद संभव हो सकता है।

 

 

विधेयक के विफल होने के बाद सरकार के पास कई संभावित रास्ते मौजूद हैं:-

  • दोबारा पेश करना: आगामी सत्र में बिल को फिर से लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है, जहां पूरी प्रक्रिया दोहरानी होगी।

  • संशोधन के साथ वापसी: विपक्ष की आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए बिल में बदलाव कर फिर से पेश किया जा सकता है।

  • राजनीतिक सहमति बनाना: विभिन्न दलों के साथ बातचीत कर सहमति बनाई जा सकती है, जिससे विशेष बहुमत हासिल करना आसान हो।

 

बिल के गिरने के बाद 2029 का लोकसभा चुनाव मौजूदा 543 सीटों पर ही होने की संभावना है। परिसीमन न होने के कारण सीटों की संख्या में कोई बदलाव नहीं होगा और महिला आरक्षण भी लागू नहीं किया जा सकेगा। इससे दक्षिणी राज्यों की प्रतिनिधित्व संबंधी चिंताएं फिलहाल टल जाएंगी, लेकिन महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की योजना में देरी होगी।

 

यह विधेयक केवल महिला आरक्षण तक सीमित नहीं था, बल्कि संसद की संरचना, संघीय संतुलन और प्रतिनिधित्व के व्यापक मुद्दों से भी जुड़ा हुआ है। इसके विफल होने के बाद अब राजनीतिक सहमति और रणनीतिक पहल आगे की दिशा तय करेंगी।


 

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