>उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। नए साल की शुरुआत के साथ ही समाजवादी पार्टी ने एक नई राजनीतिक पहल कर राज्य की सियासत को गरमा दिया है। बीजेपी की हालिया ब्राह्मण बैठक के बाद सपा के आयोजन ने राजनीतिक दलों के बीच चर्चाओं को और बढ़ा दिया है।
>1 जनवरी को लखनऊ स्थित समाजवादी पार्टी कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में बाटी-चोखा भोज का आयोजन किया गया, जिसमें विभिन्न वर्गों के लोगों, पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं ने हिस्सा लिया। इस दौरान सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लोगों से मुलाकात की। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस आयोजन के जरिए सपा ने बीजेपी की ब्राह्मण बैठक के बाद बने माहौल को साधने का प्रयास किया है।
>सपा नेता शिवपाल यादव ने मीडिया से बातचीत में कहा, बीजेपी के सदस्य जाति के आधार पर बात करते हैं। ब्राह्मण समाज के लोग समाजवादी पार्टी में आएं, उनका सम्मान मिलेगा।
>राजनीतिक पृष्ठभूमि में देखें तो यूपी में जातीय वोट गणित हमेशा अहम रहा है। 2022 विधानसभा चुनाव में ब्राह्मणों के 89 प्रतिशत और ठाकुरों के 87 प्रतिशत वोट बीजेपी+ को मिले, जबकि यादवों के 83 प्रतिशत और मुस्लिमों के 79 प्रतिशत वोट सपा+ को प्राप्त हुए थे। सत्ता और संगठन में भी ब्राह्मणों की भूमिका प्रभावी मानी जाती है, वहीं ओबीसी और दलित आबादी राज्य में बहुसंख्यक है।
>सियासी बयानबाज़ी भी तेज है। अखिलेश यादव ने दावा किया कि 2027 में सपा सरकार बनाएगी। बीजेपी प्रवक्ता आर.पी. सिंह ने कहा कि अखिलेश यादव को अपने विधायकों के टूटने की चिंता है। सपा प्रवक्ता उदयवीर सिंह और कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने भी बीजेपी पर आरोप लगाए, जबकि मंत्री ओपी राजभर ने कहा कि जनता एनडीए के साथ है।
>राजनीतिक बैठकों, भोज आयोजनों और बयानों के बीच यूपी में 2027 से पहले जातीय समीकरणों को लेकर रणनीतिक गतिविधियां लगातार बढ़ती दिख रही हैं।
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