UP Politics (अखिलेश वाजपेयी): केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने शुक्रवार को यहां भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के उद्घाटन के साथ यूपी में विधानसभा चुनाव 2027 का शंखनाद कर दिया। यह भी साफ कर दिया कि चुनाव योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर ही लड़़ा जाएगा । चुनाव बाद यदि भाजपा तीसरी बार सरकार बनाने में सफल होती है तो मुख्यमंत्री योगी जी ही होंगे । इस तरह उन्होंने चुनाव बाद मुख्यमंत्री तय होने जैसे बयान देने वाले नेताओं को आगाह भी किया कि कोई अनर्गल बयानबाजी न की जाए। यह संदेश भी देने की कोशिश की कि उनके और योगी के बीच मतभेदों की खबरों में कोई दम नहीं है । केंद्रीय नेतृत्व का पूरा समर्थन योगी को है। चुनावी कमान पूरी तरह वह (शाह) संभालेंगे और चुनावी चौसर विकास के साथ हिंदुत्व के एजेंडे पर ही सजेगी। पार्टी की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक का उद्घाटन करने आए शाह ने अपने इस एक दिनी लखनऊ दौरे में वह सब किया जो चुनाव के लिहाज से जरूरी था । उन्होंने योगी के राजकाज की खूब तारीफ भी की ।
एक सप्ताह पहले काशी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का योगी की नीति, निर्णयों तथा नेतृत्व की प्रशंसा करना बताता है कि केंद्रीय नेतृत्व पूरी मजबूती के साथ योगी के पीछे खड़ा है । वह नहीं चाहता है कि भाजपा सरकार की बागडोर को लेकर लोगों को कोई गलतफहमी हो । हालांकि अटल बिहारी वाजपेयी और कल्याण सिंह के समय भी एक तरह से यह पहले ही स्पष्ट रहता था कि सरकार बनने पर कौन मुख्यमंत्री का चेहरा होगा । पर, घोषित तौर पर पार्टी यही कहती थी कि चुनाव बाद निर्वाचित होकर आने वाले विधायक इस बारे में फैसला लेंगे । जहां तक याद आता है तो भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने पहली बार रणनीति बदलते हुए चुनाव बाद सरकार बनने पर अगले मुख्यमंत्री के नाम को लेकर अभी से संशय खत्म करने की कोशिश की है ।

दुविधा का माहौल नहीं चाहती बीजेपी
यह अकारण नहीं है । भाजपा के चुनावी व्यूहकार अमित शाह भी शायद यह मानते हैं कि 2022 के चुनाव में पार्टी की जीत का आंकड़ा 300 से नीचे आने तथा लोकसभा चुनाव 2024 में यूपी में भाजपा के आधे से अधिक सांसदों के हार जाने के पीछे योगी आदित्यनाथ को बनाया गया संशय का माहौल था । ऐसा लगता है कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने भी यह मान लिया है कि जनता को योगी का कोई विकल्प नहीं चाहिए । इसीलिए अमित शाह ने कार्यसमिति की बैठक के जरिये ऐसा कोई प्रयास नहीं छोड़ा जो योगी के साथ पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के मजबूती से खड़े होने का संदेश देने वाला न हो ।

कानून-व्यवस्था, विरासत से लेकर विकास तक तारीफ
अमित शाह ने विरासत से लेकर विकास के कामों तक योगी की रीति-नीति की मुक्त कंठ से प्रशंसा की । कानून-व्यवस्था पर काबू और माफिया तथा अपराधियों के साथ सख्ती की योगी की रणनीति की प्रशंसा की । यह कहकर कि योगी की बीठ भी थपथपाई कि मुख्यमंत्री के रूप में योगी ने उत्तर प्रदेश को उद्योग, उद्यम तथा उद्यमियों का उत्साह बढ़ाने वाला प्रदेश बनाकर दिखा दिया है। जिस प्रदेश में उद्योगपति आने से घबराते थे वहां एक के बाद एक उद्योग लोगों के लिए रोजगार का दरवाजा खोल रहे हैं । योगी की दवाई से दंगाइयों के हौसले पस्त हैं । रामलला का भव्य राममंदिर सनातनियों के सरोकारों का विश्वव्यापी उद्घोष कर रहा है । सिर्फ राममंदिर ही नहीं अन्य अनेक मंदिरों को उनके उनके महत्व के अनुसार विस्तार के अनुसार संवारने के काम उल्लेखनीय स्तर तक हुए हैं । शाह ने एक तरह कार्यकर्ताओं से आग्रह किया कि वे लोगों को समझाएं कि उन्हें राममंदिर निर्माण के लिए समर्पित और दूसरी तरफ कारसेवकों पर गोलियां चलवाने वालों लोगों को बीच चुनाव करना है । लोगों से पूछें कि क्या वे कारसेवकों पर गोली चलवाने वाले को वोट देना पसंद करेंगे ।

आक्रामकता के साथ उतरने का संकेत
शाह ने साफ कर दिया है कि योगी ने अपना राजनीतिक कद ही नहीं बढ़ाया है । खुद को ही मजबूत नहीं किया है बल्कि पार्टी के भीतर करिशमाई नेता की छवि को मजबूत किया है । योगी की तरह हिंदुत्व के एजेंडे को धार देने वाला कोई दूसरा नेता भाजपा के पास फिलहाल नहीं है । कार्यकर्ताओं के पास लोगों के बीच पार्टी की चर्चा को बढ़ाने के लिए कोई बड़ा मुद्दा होना जरूरी है शायद इसीलिए शाह ने बैठक में यह ऐलान भी किया कि तीसरी बार यूपी में भाजपा की सरकार बनी तो समान नागरिक संहिता अर्थात कॉमन सिविल कोड (यूसीसी) लागू किया जाएगा । जाहिर है कि अपने इस एक दिवसीय दौरे में शाह ने यूसीसी के रूप में एक नया मुद्दा दे दिया है जिसके इर्द-गिर्द चुनावी चर्चा घूमेगी । यह बताने की जरूरत नहीं कि यूसीसी के बहाने हिंदुत्व एजेंडे के केंद्र में होगा और इस पिच पर विपक्ष भी खेलने को मजबूर होगा ।
लड़ाई योगी बनाम अखिलेश बनाने का प्रयास
बैठक में शाह ने कार्यकर्ताओं को वे सियासी हथियार भी मुहैया कराने की कोशिश की जिनके जरिये भाजपा आने वाले दिनों में विपक्ष को घेरती मिलेगी । उन्होंने कांग्रेस और राहुल के नाकामियों की विस्तार से चर्चा करते हुए एक तरह से यह समझाने की कोशिश की कि पार्टी के लोगों को आम जनता के बीच इनका उल्लेख कर यह प्रचारित करने की जरूरत है कि राहुल के अखिलेश के साथ आने से उत्तर प्रदेश में कोई बड़ा बदलाव नहीं होने वाला । जिस उत्तर प्रदेश में कांग्रेस चार दशक से अधिक समय से सत्ता से बाहर हैं वहां उसने कुछ ऐसा बड़ा काम नहीं कर दिया है जो उसके पास रातोंरात जनता का समर्थन आ जाएगा । जाहिर है कि शाह चाहते हैं कि चुनावी मुकाबला योगी बनाम अखिलेश सजे ताकि भाजपा को कानून-व्यवस्था बनाम अपराधी और अराजकता, हिंदुओं के सम्मान व स्वाभिमान की रक्षा बनाम मुस्लिम तुष्टीकरण, पारदर्शी शासन-प्रशासन बनाम भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने में आसानी रहे । इसलिए शाह ने सिर्फ राहुल और कांग्रेस की असफलताओं का ही विस्तार से जिक्र नहीं किया बल्कि बसपा या मायावती का नाम तक नहीं लिया ।
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