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UP Rajya Sabha Election 2026: BJP में 8 चेहरों पर मंथन, SP ने खोले पत्ते; जानिये क्या है 37 वोट का गणित

उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए 16 अक्टूबर को मतदान होगा। भाजपा ने अभी अपने पत्ते पूरी तरह नहीं खोले हैं, जबकि समाजवादी पार्टी ने रामगोपाल यादव और धनराज परिमल नथवानी को उम्मीदवार बनाया है। वही कांग्रेस और बसपा के पास अपने दम पर सीट जीतने के लिए पर्याप्त विधानसभा संख्या ही नहीं है।
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Bureau News Desk
30 Sep 2026
02:19 PM
1 min read
UP Rajya Sabha Election 2026: BJP में 8 चेहरों पर मंथन, SP ने खोले पत्ते; जानिये क्या है 37 वोट का गणित
हाइलाइट्स
उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए 16 अक्टूबर को मतदान होगा।
भाजपा ने 30 सितंबर तक अपने उम्मीदवारों की आधिकारिक सूची जारी नहीं की थी; कई नाम चर्चा में हैं।
सपा ने रामगोपाल यादव और धनराज परिमल नथवानी को उम्मीदवार बनाया है।
एक राज्यसभा सीट के लिए मौजूदा गणित में करीब 37 प्रथम वरीयता वोट की जरूरत है।

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राज्यसभा का यह चुनाव महज 10 सीटों का चुनाव नहीं है। विधानसभा के भीतर मौजूद संख्या, सहयोगी दलों की भूमिका, उम्मीदवारों के चयन और अतिरिक्त वोटों की दिशा—इन सभी पर राजनीतिक दलों की नजर है। चुनाव आयोग के कार्यक्रम के मुताबिक उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए 16 अक्टूबर को मतदान होगा और उसी दिन मतगणना भी होगी। नामांकन की अंतिम तारीख 6 अक्टूबर है।

इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा भाजपा के उम्मीदवारों को लेकर है। भाजपा के पास विधानसभा में सबसे बड़ा संख्याबल है, लेकिन पार्टी ने 30 सितंबर तक अपने उम्मीदवारों की आधिकारिक सूची जारी नहीं की थी। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने अपने दो नाम घोषित कर चुनावी तस्वीर का पहला बड़ा हिस्सा साफ कर दिया है। अब नजर इस बात पर है कि भाजपा किन चेहरों को राज्यसभा भेजती है और क्या अन्य दल अतिरिक्त उम्मीदवार उतारकर मुकाबले को मतदान तक ले जाते हैं।

भाजपा ने रखा सस्पेंस बरकरार: कौन होंगे आठ चेहरे?

उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों में मौजूदा तौर पर भाजपा के आठ सदस्य हैं। इनमें सात सदस्यों का कार्यकाल नवंबर में समाप्त हो रहा है, जबकि दिनेश शर्मा राज्यसभा से पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं। चुनावी गणित में इसी वजह से भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल उम्मीदवारों के चयन का है।

भाजपा के प्रदेश संगठन की ओर से केंद्रीय नेतृत्व को उम्मीदवारों के लिए नामों का पैनल भेजे जाने की खबरें हैं। सूत्रों की माने तो करीब 25 नामों पर विचार किया गया है, जबकि अंतिम स्तर पर लगभग 20 नामों में से चयन की चर्चा है।

चर्चा में आए नामों में पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी, पूर्व केंद्रीय मंत्री कौशल किशोर, पूर्व एटा सांसद राजवीर सिंह, पूर्व बस्ती सांसद हरीश द्विवेदी, वरिष्ठ अधिवक्ता राघवेंद्र सिंह और पूर्व राज्यसभा सांसद विनय प्रभाकर सहस्रबुद्धे जैसे नाम शामिल बताए जा रहे हैं। कुछ अन्य रिपोर्टों में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, वरुण गांधी, संजीव बालियान, सत्यपाल सिंह और कुमार विश्वास के नाम भी चर्चा में बताए गए हैं। हालांकि इनमें से किसी नाम को भाजपा का आधिकारिक उम्मीदवार नहीं माना जा सकता, जब तक पार्टी औपचारिक घोषणा नहीं करती।

यही इस चुनाव को दिलचस्प बनाता है। भाजपा के सामने केवल आठ नाम चुनने का सवाल नहीं है, बल्कि उम्मीदवारों के चयन में क्षेत्रीय और सामाजिक प्रतिनिधित्व, पुराने नेताओं को अवसर तथा नए चेहरों को जगह देने जैसे कई पहलुओं पर विचार किए जाने की कश्मकश की चर्चा सामने आई हैं। इन चर्चाओं को लेकर अलग-अलग मीडिया रिपोर्टों में अलग-अलग नाम सामने आए हैं, इसलिए अंतिम सूची का इंतजार महत्वपूर्ण है।

भाजपा के मौजूदा सांसदों की सीटें भी दांव पर

जिन भाजपा सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, उनमें अरुण सिंह, गीता शाक्य, नीरज शेखर, बृजलाल, बीएल वर्मा, सीमा द्विवेदी और हरदीप सिंह पुरी शामिल हैं। दिनेश शर्मा की सीट उनके इस्तीफे के बाद पहले ही खाली हो चुकी है।

इसका मतलब यह है कि इस चुनाव में मौजूदा सांसदों की वापसी और नए चेहरों के प्रवेश—दोनों संभावनाओं पर नजर रहेगी। भाजपा की अंतिम सूची आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि पार्टी कितने पुराने चेहरों को दोबारा मौका देती है और कितने नए नाम सामने आते हैं।

सपा ने खोले पत्ते, रामगोपाल यादव फिर मैदान में

जहां भाजपा की ओर से अभी उम्मीदवारों पर सस्पेंस बना हुआ है, वहीं समाजवादी पार्टी ने अपने दो उम्मीदवारों के नाम घोषित भी कर दिए हैं। सपा ने वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय महासचिव प्रोफेसर रामगोपाल यादव तथा धनराज परिमल नथवानी को उत्तर प्रदेश से राज्यसभा उम्मीदवार बनाया है। दोनों ने आज 30 सितंबर को नामांकन भी दाखिल कर दिया है।

रामगोपाल यादव सपा के सबसे अनुभवी संसदीय नेताओं में शामिल हैं। वह कई कार्यकाल से राज्यसभा में पार्टी का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और संगठन तथा संसदीय राजनीति में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनके नाम की उम्मीद पहले से ही लगाई जा रही थी।

दूसरा नाम धनराज परिमल नथवानी का है, जिसने चुनावी चर्चा को अलग दिशा दी है। नथवानी रिलायंस इंडस्ट्रीज में ग्रुप प्रेसिडेंट हैं और खेल प्रशासन से भी जुड़े रहे हैं। विभिन्न रिपोर्टों के मुताबिक वे गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन और गुजरात स्टेट फुटबॉल एसोसिएशन से भी जुड़े रहे हैं। उनके पिता परिमल नथवानी भी राज्यसभा सांसद हैं।

नथवानी का उत्तर प्रदेश की सक्रिय चुनावी राजनीति से पारंपरिक जुड़ाव नहीं रहा है। इसलिए सपा द्वारा उन्हें उम्मीदवार बनाए जाने को लेकर राजनीतिक हलकों में अलग-अलग चर्चाएं हैं। हालांकि उनके चयन के पीछे पार्टी नेतृत्व की वास्तविक रणनीति क्या है, इसका आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।

37 वोट में एक राज्यसभा सीट का गणित

अब आते हैं इस चुनाव के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से पर—नंबर गेम। उत्तर प्रदेश विधानसभा की कुल 403 सीटों में से मौजूदा प्रभावी संख्या 397 बताई जा रही है, क्योंकि छह सीटें रिक्त हैं। 10 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव होने के कारण एक सीट के लिए आवश्यक प्रथम वरीयता वोट का गणित करीब 37 वोट बैठता है।

सरल भाषा में समझें तो:

  • 1 सीट के लिए करीब 37 वोट
  • 2 सीटों के लिए 74 वोट
  • 3 सीटों के लिए 111 वोट

राज्यसभा चुनाव में विधायक प्राथमिकता के आधार पर मतदान करते हैं और चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व तथा एकल संक्रमणीय मत प्रणाली से होता है। इसलिए यहां विधानसभा चुनाव जैसा सीधा “एक उम्मीदवार-एक वोट” वाला गणित नहीं होता।

भाजपा और सहयोगियों के पास कितना संख्याबल?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार भाजपा के पास उत्तर प्रदेश विधानसभा में 256 विधायक हैं। सहयोगी दलों को जोड़ने पर संख्या 292 और जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के दो विधायकों के समर्थन को शामिल करने पर एनडीए का आंकड़ा 294 बताया गया है। वहीं समाजवादी पार्टी के 101 और कांग्रेस के दो विधायक मिलाकर सपा-कांग्रेस खेमे की संख्या 103 है।

हालांकि अलग-अलग मीडिया रिपोर्टों में सहयोगी और समर्थक विधायकों को शामिल करने के तरीके के कारण आंकड़ों में थोड़ा अंतर दिखाई देता है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने एक रिपोर्ट में एनडीए के लिए 289 और सपा नेतृत्व वाले खेमे के लिए 103 का आंकड़ा दिया था। इसलिए अंतिम उम्मीदवारों के नाम आने और वास्तविक मतदान के समय मौजूद विधायकों की स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी होगा।

आठवीं और दसवीं सीट पर क्यों बढ़ सकती है दिलचस्पी?

मौजूदा विधानसभा संख्या को आधार बनाकर इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट किया है कि भाजपा-नीत गठबंधन के पास आठ सीटों के लिए आवश्यक संख्या का गणित बनता है, जबकि सपा-कांग्रेस के पास दो सीटों के लिए संख्या दिखाई देती है। लेकिन उसी रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि क्रॉस-वोटिंग और अनुपस्थिति जैसे कारक अंतिम परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं। यानी कागज पर मौजूद संख्या और मतदान के दिन पड़ने वाले वोटों में अंतर संभव है।

यहीं से अतिरिक्त वोटों की अहमियत बढ़ जाती है। यदि कोई दल अपनी संख्या के आधार पर निर्धारित सीटों से अधिक उम्मीदवार मैदान में उतारता है तो उसे अतिरिक्त समर्थन जुटाना होगा। इसी वजह से छोटी पार्टियों, निर्दलीय विधायकों और दोनों बड़े खेमों से अलग रुख रखने वाले विधायकों पर भी नजर रहेगी।

बसपा के सामने अलग तरह की चुनौती

इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की स्थिति भी महत्वपूर्ण है। बसपा के पास उत्तर प्रदेश विधानसभा में कोई विधायक नहीं है। पार्टी के राज्यसभा सांसद रामजी गौतम का कार्यकाल भी समाप्त हो रहा है। इसलिए बसपा अपने दम पर 37 प्रथम वरीयता वोट जुटाने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में उसका राज्यसभा प्रतिनिधित्व बनाए रखना किसी अन्य दल के समर्थन पर निर्भर हो सकता है।

यहीं से भाजपा और बसपा के बीच संभावित राजनीतिक समीकरण को लेकर चर्चा शुरू होती है। कुछ रिपोर्टों में सवाल उठाया गया है कि क्या भाजपा-नीत गठबंधन बसपा उम्मीदवार के लिए रास्ता बनाएगा। हालांकि इस संबंध में कोई अंतिम आधिकारिक फैसला सामने नहीं आया है।

कांग्रेस की भूमिका क्या होगी?

कांग्रेस के पास उत्तर प्रदेश विधानसभा में दो विधायक हैं। अकेले कांग्रेस के लिए राज्यसभा की एक सीट के लिए आवश्यक संख्या जुटाना संभव नहीं है। मौजूदा विधानसभा गणित में उसका महत्व सपा के साथ गठबंधन/समर्थन के संदर्भ में अधिक दिखाई देता है। सपा के 101 और कांग्रेस के दो विधायकों को जोड़ने पर यह संख्या 103 होती है। यही संख्या सपा को दो सीटों के लिए अपने चुनावी गणित में आधार देती है। हालांकि कांग्रेस की ओर से 30 सितंबर तक उत्तर प्रदेश की इन राज्यसभा सीटों के लिए कोई अलग उम्मीदवार घोषित नहीं किया गया था।

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