मोदीनगर बस बम विस्फोट 1996 जैसा दिल दहला देने वाला मामला, जिसने पूरे उत्तर भारत की अंतरात्मा को झकझोर दिया था, उस केस में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मोहम्मद इलियास को बरी कर दिया है। अदालत के अनुसार अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोप साबित करने में बुरी तरह विफल रहा, इसलिए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि और सजा को बरकरार नहीं रखा जा सकता।
यह फैसला न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा की खंडपीठ ने सुनाया, जिन्होंने इलियास की अपील स्वीकार करते हुए कहा कि पुलिस के समक्ष दिए गए कथित कबूलनामे को साक्ष्य मानना कानूनी त्रुटि है, क्योंकि साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 के तहत ऐसा बयान स्वीकार्य नहीं होता।
हाई कोर्ट ने अपने 10 नवंबर के आदेश में स्पष्ट टिप्पणी की कि अभियोजन न तो षड्यंत्र साबित कर सका और न ही आरोपी को विस्फोट से जोड़ने वाला कोई स्वतंत्र, विश्वसनीय साक्ष्य पेश कर पाया। इसके साथ ही पुलिस की मौजूदगी में रिकॉर्ड किया गया ऑडियो कबूलनामा कानूनी रूप से अमान्य है। और यदि इसे केस से अलग कर दिया जाए तो इलियास के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं बचता। यहाँ तक की न्यायेतर स्वीकारोक्ति के गवाह भी अदालत में मुकर गए। अदालत ने यह भी कहा कि निर्णय भारी मन से दिया जा रहा है, क्योंकि यह विस्फोट एक आतंकी हमले जैसा था, जिसमें 18 लोगों की मौत और कई दर्जन लोग घायल हुए थे।
क्या हुआ था 27 अप्रैल 1996 को?
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दिल्ली से गाजियाबाद की ओर जा रही बस में कुल 67 यात्री सवार थे।
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शाम लगभग 5 बजे, मोदीनगर थाना क्षेत्र पार करते ही बस के आगे के हिस्से में जबरदस्त बम धमाका हुआ।
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मौके पर ही 10 लोगों की मौत हो गई और करीब 48 यात्री घायल हुए।
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फॉरेंसिक जांच में पता चला कि चालक की सीट के नीचे कार्बन मिश्रित RDX रखा गया था।
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विस्फोट रिमोट डिवाइस से किया गया था।
अभियोजन का दावा था कि यह हमला पाकिस्तानी नागरिक और हरकत-उल-अंसार संगठन के कथित कमांडर अब्दुल मतीन उर्फ इक़बाल ने इलियास और तसलीम के साथ मिलकर अंजाम दिया।
तसलीम पहले ही बरी, अब इलियास भी मुक्त
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2013 में निचली अदालत ने सह-आरोपी तसलीम को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था।
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लेकिन अदालत ने इलियास और अब्दुल मतीन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
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तसलीम को बरी किए जाने के खिलाफ सरकार ने अपील भी नहीं की।
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अब हाई कोर्ट ने कहा कि इलियास के खिलाफ भी विश्वसनीय सबूत नहीं बचे, इसलिए सजा रद्द की जाती है।
अब्दुल मतीन के संबंध में यह जानकारी उपलब्ध नहीं कि उसने कोई अपील दायर की या नहीं।
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