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आंख की समस्या लेकर भर्ती हुआ मरीज, ग्लूकोज की एक्सपायरी डेट ने खड़े किए सवाल

परिजनों ने एक्सपायरी डेट निकल चुके ग्लूकोज के इस्तेमाल का आरोप लगाया; अस्पताल प्रशासन ने कहा कि मामले की जांच की जा रही है।
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Bureau News Desk
29 Sep 2026
03:12 PM
1 min read
आंख की समस्या लेकर भर्ती हुआ मरीज, ग्लूकोज की एक्सपायरी डेट ने खड़े किए सवाल
सोर्स - संवाददाता रवि दुबे
हाइलाइट्स
महामाया मेडिकल कॉलेज, सदरपुर में ग्लूकोज की एक्सपायरी डेट को लेकर मामला सामने आया।
वार्ड नंबर 13 में भर्ती सुनील कुमार के उपचार के दौरान ग्लूकोज चढ़ाया गया था।
मरीज के परिजनों ने ग्लूकोज की अवधि समाप्त होने का आरोप लगाया।
मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. मुकेश यादव ने जांच की बात कही।

अंबेडकरनगर। महामाया मेडिकल कॉलेज, सदरपुर में भर्ती एक मरीज के उपचार के दौरान इस्तेमाल किए गए ग्लूकोज को लेकर मामला सामने आया है। मरीज के परिजनों ने ग्लूकोज की एक्सपायरी डेट निकल जाने का आरोप लगाया है। शिकायत सामने आने के बाद अस्पताल में मरीजों को दी जाने वाली दवाओं और अन्य चिकित्सा सामग्री की जांच व्यवस्था को लेकर सवाल उठे हैं।

मामले में अस्पताल प्रशासन की ओर से जांच की बात कही गई है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि मरीज को चढ़ाया गया ग्लूकोज वास्तव में एक्सपायर्ड था या नहीं। इसकी वास्तविक स्थिति जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी। जानकारी के अनुसार, अकबरपुर क्षेत्र के दहीरपुर निवासी सुनील कुमार को आंख में समस्या के चलते महामाया मेडिकल कॉलेज, सदरपुर में भर्ती कराया गया था। उन्हें अस्पताल के वार्ड नंबर 13 में रखा गया था।

उपचार के दौरान मरीज को ग्लूकोज चढ़ाया गया। इसी दौरान मरीज के परिजनों ने ग्लूकोज की एक्सपायरी डेट को लेकर सवाल उठाए। परिजनों का कहना है कि जिस ग्लूकोज का इस्तेमाल किया जा रहा था, उसकी निर्धारित अवधि समाप्त हो चुकी थी। मामला सामने आने के बाद अस्पताल में मौजूद अन्य तीमारदारों के बीच भी इसको लेकर चर्चा हुई। शिकायत का मुख्य बिंदु मरीज को दिए जा रहे ग्लूकोज की एक्सपायरी डेट और अस्पताल में चिकित्सा सामग्री की जांच से जुड़ा है।

किसी भी दवा या चिकित्सा सामग्री के इस्तेमाल से पहले उसकी वैधता अवधि की जांच की जाती है। इसी संदर्भ में इस मामले में भी सवाल उठे हैं कि मरीज को दिए गए ग्लूकोज की एक्सपायरी डेट की जांच किस स्तर पर हुई। परिजनों की शिकायत के बाद अब यह पता लगाया जाना है कि ग्लूकोज की वास्तविक एक्सपायरी डेट क्या थी और यदि उसकी अवधि समाप्त हो चुकी थी तो वह मरीज के उपचार तक कैसे पहुंचा। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर अभी यह पुष्टि नहीं हुई है कि ग्लूकोज वास्तव में एक्सपायर्ड था। इसलिए मामले की स्थिति को जांच के निष्कर्ष के आधार पर ही स्पष्ट माना जा सकेगा।

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मामले को लेकर महामाया मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. मुकेश यादव ने कहा, "पता कर रहे हैं कि यह गड़बड़ी कहां से हुई।" प्राचार्य के इस बयान के बाद अस्पताल प्रशासन की ओर से मामले की जानकारी जुटाई जा रही है। जांच में यह देखा जाना है कि मरीज को लगाए गए ग्लूकोज की वैधता अवधि क्या थी और अस्पताल की ओर से उसे मरीज के उपचार में इस्तेमाल किए जाने से पहले आवश्यक जांच की गई थी या नहीं।

मरीज के परिजनों ने मामले की जांच कराने और जिम्मेदारी तय करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि ग्लूकोज की एक्सपायरी डेट समाप्त हो चुकी थी, तो इसकी जानकारी सामने आनी चाहिए और संबंधित स्तर पर जिम्मेदारी निर्धारित की जानी चाहिए। फिलहाल अस्पताल प्रशासन की जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मामले में वास्तव में क्या हुआ था। जांच के दौरान ग्लूकोज की पैकिंग, एक्सपायरी डेट और मरीज के उपचार से संबंधित परिस्थितियों की जानकारी सामने आना महत्वपूर्ण होगा।

मरीजों को उपचार के दौरान दी जाने वाली दवाओं और चिकित्सा सामग्री की गुणवत्ता तथा वैधता उनकी सुरक्षा से सीधे जुड़ी होती है। इसी वजह से इस मामले में भी ग्लूकोज की एक्सपायरी डेट को लेकर उठी शिकायत की जांच महत्वपूर्ण है। हालांकि, अभी तक उपलब्ध जानकारी में यह सामने नहीं आया है कि मरीज को एक्सपायर्ड ग्लूकोज दिए जाने की पुष्टि हो चुकी है। अस्पताल प्रशासन की ओर से मामले की जांच किए जाने की बात कही गई है।

दहीरपुर निवासी सुनील कुमार आंख की समस्या के उपचार के लिए महामाया मेडिकल कॉलेज, सदरपुर में भर्ती हुए थे। उन्हें वार्ड नंबर 13 में रखा गया था। उपचार के दौरान उन्हें ग्लूकोज चढ़ाया गया। इसी दौरान उनके परिजनों ने ग्लूकोज की एक्सपायरी डेट को लेकर आपत्ति जताई। शिकायत के बाद अस्पताल प्रशासन के सामने मामले की जानकारी पहुंची। मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. मुकेश यादव ने बताया कि यह पता लगाया जा रहा है कि गड़बड़ी कहां से हुई। अब मामले में जांच के निष्कर्ष का इंतजार है। इसी के आधार पर यह स्पष्ट होगा कि ग्लूकोज की एक्सपायरी डेट समाप्त हुई थी या नहीं और यदि ऐसा था तो वह मरीज के उपचार में इस्तेमाल होने तक कैसे पहुंचा।

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